Monday, 28 October 2013

प्याज का करिश्मा - डॉ. हनुमान गालवा


http://newstoday.epapr.in/178083/Newstoday-Jaipur/28-10-2013#page/5/1

प्याज का करिश्मा
 - डॉ. हनुमान गालवा
हमारा देश वाकई करिश्माई है। रोज नए-नए करिश्मे और चमत्कार। समोसे में आलू है, लेकिन संसद से लालू गायब हो चुके हैं। घोटाले की गेंद से रशीद मसूद भाई भी क्लीन बॉल्ड हो गए हैं तो तय है कि अब राजनीति के पिच पर दागी नहीं खेल पाएंगे। यह भी किसी सपने से कम नहीं है कि सजा होते ही सत्ता का स्विच स्वत: ही ऑफ हो जाएगा। अब तो राजनीति दलों का टिकिट नेटवर्क भी दागियों के लाइन कनेक्ट हो जाने पर भी 'नोट रिचेबलÓ हो जाएगा। खैर, राजनीति में तो करिश्मे, चत्मकार होते रहते हैं। बाबा सोने के खजाने का चमत्कार दिखा रहे हैं। सरकार आम आदमी का जाप छोड़कर खजाना...खजाना जप रही है। जब देश में चहुंओर चमत्कार हो रहा है तो फिर किसान के खेत का प्याज भी खामोश क्यों बैठा रहे? आखिर प्याज ने अपनी उछल-कूद से कई बार सरकार बदलने और बनाने का करिश्मा कर दिखाया है, तो उसके चमत्कार को कौन नहीं नमस्कार करेगा? किसान के खेत का एक रुपए किलो का प्याज दिल्ली में जाकर एक सौ रुपए का हो गया। दिल्ली जाकर नेताओं के भाव बढ़ जाते हैं, तो फिर प्याज अपने नखरे क्यों नहीं दिखलाएगा? प्याज के करिश्मे को समझने के लिए अतीत की परतें उधेडऩी पड़ेंगी। मिस्टर क्लीन कह करते थे कि दिल्ली से एक रुपया भेजते हैं, जो गांव के गरीब तक पहुंचते-पहुंचते पंद्रह पैसे रह जाता है। एक रुपए के पंद्रह पैसे में सिमट जाने की गुत्थी को भी प्याज के करिश्मे से ही सुलझाया जा सकता है। किसान के हाथ से प्याज निकलता है, तब उसे कोई खास भाव नहीं देता है। मंडी में थोक एवं खुदरा विक्रेताओं के चमत्कारिक स्पर्श  से प्याज आम से खास हो जाता है। भंडार में रहते-रहते प्याज को चमत्कारिक बाबा की तरह अपनी शक्ति का अहसास होता है। कुछ दिन विश्राम के बाद जब प्याज ठेले पर विराजमान होकर गली-कूचे में भ्रमण करता है, तब उसे अपनी अहमियत का अंदाज हो जाता है। यहीं आकर सरकार को उसके छिलके भी डराने लगते हैं, लेकिन सत्ता में आने के सपने पाले प्रतिपक्ष को उसका तीखापन भी मीठेपन का अहसास देता है। प्याज सरकार के लिए बम है, तो सत्ताभिलाषी विपक्षी नेताओं के लिए सपने साकार करने वाला बाबा है। प्याज का सपना किसी को राजयोग दिखाता है, तो किसी को सत्तावियोग। यह प्याज का ही चमत्कार है कि एक ही सपने में संयोग और वियोग दोनों तरह की अनुभूति का अहसास हो जाता है। प्याज शनि की तरह कुंडली में बैठकर किसी को राजा भी बना सकता है और राजा को रंक भी बना सकता है।
न्यूज टुडे जयपुर  में 28 अक्टूबर, 2013 को प्रकाशित व्यंग्य

Monday, 21 October 2013

बाबा का सपना और सरकार - डॉ. हनुमान गालवा


http://newstoday.epapr.in/c/1806608

बाबा का सपना और सरकार
- डॉ. हनुमान गालवा
किसी सपने पर कार्रवाई करने वाली हमारी सरकार दुनिया में पहली सरकार है। एक बाबा ने सपने में सोने का खजाना देखा। सरकार तुरंत उसकी खोज में खुदाई करने लगी। मीडिया खुदाई का लाइव कवरेज पूरे देश को दिखा रहा है। देखने को गांधी बाबा ने भी देश में ग्राम स्वराज्य का सपना देखा था। ग्राम स्वराज्य को खोजने का कोई सरकारी प्रयास नहीं हुआ। अब तो सरकार बाबा-बाबा में भी भेद करने लगी है। दिल्ली में आकर विदेशी बैंक में छिपे हमारे खजाने का सपना दिखाने वाले बाबा का लाठी से सत्कार करती है। एक बाबा ने सपने में देखा कि एक बाला को प्रेतात्मा सता रही है। बाबा अपने सपने के बारे में बता देते तो शायद कोई नागर, कांडा या मदेरणा भी कुछ मदद करते। बाबा तो आखिर बाबा ठहरे। उनको किसका भय। खुद ही भूत उतरने लगे। बाबा ने सरकार के दूतों पर भरोसा नहीं किया। अब पछताने से क्या होता है? सपने में सोने का खजाना देखने वाले बाबा ने सत्ता के दूतों पर भरोसा किया तो दूतों ने भी उनके सपने पर विश्वास किया। अब सरकार खजाने की खोज में खुदाई में लगी है। इस खुदाई में हम घोटालों के गम भूल चुके हैं। दंगों के जख्म भर गए हैं। भगदड़ का भूत हमें कहीं नहीं दिख रहा है। अब पूरा देश खजाने के सपने में जुटा है। जैसे सोना मिलेगा तो सभी संकटों का निवारण हो जाएगा। सरकार के संकट तो टल रहे हैं तो उम्मीद की जानी चाहिए कि इससे हमारे कष्ट भी कुछ तो कम होंगे। वैसे तो सपने में भी सोना मिलना या खोना अशुभ माना जाता है। चूंकि सपना सरकार ने तो देखा नहीं। इसलिए यह अशुभ होगा तो सपना देखने वाले बाबा के लिए होगा। सरकार के लिए तो शुभ ही शुभ है। मोह-माया छोड़ चुके बाबाओं को सपने में सोना दिख रहा है। जनता के सेवकों को बाबा के सपने का खजाना दिख रहा है। खजाना मिल गया तो चमत्कारिक बाबा की साधना का जादू चल निकलेगा। खजाना नहीं भी मिला तब भी भला नुकसान क्या? चर्चा की जुगाली से कुछ दिन तो सुकून मिलेगा। सपने में भी संतोष मिल रहा है तो सपने को संवैधानिक दर्जा दिया जाना चाहिए। हमारे देश को कभी सपेरों का देश कहा जाता था। अब हम उनको बता सकते हैं कि भारत सपेरों नहीं सपनों का देश है, जहां सभी को सपने देखने का अधिकार है।
न्यूज टुडे जयपुर में 21 अक्टूबर, 2013 को प्रकाशित व्यंग्य

Wednesday, 25 September 2013

सत्ता और रोटी - डॉ. हनुमान गालवा

सत्ता और रोटी
- डॉ. हनुमान गालवा

वामपंथी मानते हैं कि सत्ता बंदूक की नाली से निकलती है। हमारी यूपीए
सरकार ने इस अवधारणा को झुठला दिया। सरकार इस धारणा को पुष्ट करने में
जुटी है कि सत्ता पेट से निकलती है। गरीब के पेट में दो-चार रोटी डालो।
सब्सिडी की लाठी से उसे हिलाओ तो उससे मतों की बारिश होगी। इस बारिश से
राज की फसल उगाओ और घोटालों की उपज काटो। राज के लिए बंदूक उठाने की
जरूरत नहीं। गरीब के पेट से सत्ता और सरकार के पेट से घोटाले और
गड़बडिय़ां पैदा होती हैं। सत्ता का पेड़ उगाने की हमारी अहिंसक तकनीक
दुनिया को नई दिशा दे सकती है। मनरेगा के तहत गड्ढ़े खुदवाओ। खाद्य
सुरक्षा अधिनियम का खाद डालो। फिर उसमें घोषणा के बीज डालो। उस पर
सब्सिडी का पानी छिडक़ो। वादों के आकर्षण से अंकुर फूट आएंगे।
आरोप-प्रत्यारोप के औजार से उसकी निराई-गुड़ाई कर दीजिए। जाति-धर्म पोषित
पौधा पेड़ बनते देर नहीं लगेगी। पेड़ पर लगे फूल (वोट) झोली में समेट
लीजिए और पूरे पांच साल खराटे भरते रहिए। इस पेड़ पर लगा फल (सत्ता) को
घोटाले और गड़बडिय़ों के आचार से ही पचाया जा सकता है। जब घोटाले और
गड़बडिय़ों के गुब्बार से निजात दिलाने में आरक्षण का चूर्ण मददगार साबित
हो सकता है। हमारी सरकार को सत्ता का पेड़ उगाने और उस पर चढ़े रहने के
फामूर्ले का तुरंत पेटेंट करवा लेना चाहिए, ताकि हमारी अपनी इस थ्योरी को
कोई अपना नहीं बता सके। अंग्रेज तो फूट डालो और राज करो नीति से देश में
कई साल जमे रहे। अब हमारी सरकार बांटो और खाओ नीति से सत्ता में बने रहने
के जुगाड़ कीर्तिमान रच रही है। जिन देशों में सत्ता के लिए संघर्ष चल
रहा है, हम उनको इस फार्मूले से संघर्ष से मुक्ति दिला सकते हैं। जंग में
बर्बाद होने की मूर्खता कर रहा अमेरिका भी हमारी थ्योरी को समझकर समझदार
बन सकता है। दुनिया चाहे तो हमारी थ्योरी का परीक्षण भी करवा सकती है।
न्यूज टूडे, जयपुर में 25 सिंतबर, 2013 को प्रकाशित व्यंग्य

http://newstoday.epapr.in/164316/Newstoday-Jaipur/25-09-2013#page/5/2

Wednesday, 11 September 2013

अंतरिक्ष पर अतिक्रमण - डॉ. हनुमान गालवा

http://newstoday.epapr.in/158539/Newstoday-Jaipur/11-09-2013#page/5/1 

अंतरिक्ष पर अतिक्रमण
- डॉ. हनुमान गालवा
मंगल ग्रह पर कॉलोनी कट रही है। बुकिंग शुरू हो चुकी है। दुनियाभर से एक लाख से ज्यादा आवेदन आ चुके हैं। आवेदनों की लॉटरी से भाग्योदय की आस लगाए भारतीय भला पीछे क्यों रहेंगे। आठ हजार से ज्यादा भारतीय भी मंगल ग्रह पर बसने की दौड़ में शामिल हैं। चांद पर कॉलोनी कटी थी। तब भी धरती पर भूखंड नहीं खरीद पाने वाले कई महापुरुषों ने चांद के टुकड़े के तोहफे से धर्मपत्नी का दिल जीत लिया था। इनमें से कई महिलाएं रोज चांद को निहारती है। अपने पति के दिए उपहार को देखती है। कयास लगाती है कि उसका भूखंड कहां होगा? हमने भी अपने मित्र से परामर्श लिया कि अपन भी धरती पर भूखंड का श्रीखंड नहीं पा सके तो क्यों न मंगल पर मंगल का सोचा जाए। मित्र को सलाह जची। बोले बात ठीक है। रही बात रहने की तो यहां प्लॉट खरीदकर कौनसे रह लेंगे? यहां खरीदेंगे तो प्लॉट रोज दिखेगा। बसने की सोचेंगे तो भूमाफिया से पंगा लेना पड़ेगा। मुकदमाबाजी होगी तो रही-सही पंूजी भी ठिकाने लग जाएगी। मंगल पर प्लॉट के लिए बुकिंग करवा लेते हैं। न प्लॉट दिखेगा और न ही मकान बनवाने की नौबत आएगी। प्लॉट देखने जाना चाहेंगे भी तब भी केवल कल्पना की उड़ान ही भरनी पड़ेगी। भूखंड का एहसास ही सुकून देता रहेगा। चांद तो फिर भी पहचान में आ जाता है। चांद रोज दिखता है तो वहां खरीदा गया प्लॉट देखे बिना रहा नहीं जाता है। देखेंगे तो याद बसने की इच्छा भी बढ़ेगी। खैर, मंगल पर मंगल की तैयार चल रही है तो हम भी पीछे क्यों रहे। पहले प्लॉट खरीदा जाए, फिर बस न सकें तो प्रोपर्टी डीलर का काम भी चल निकलेगा। कोई यह भी नहीं कह सकता कि बिना जमीन के ही प्रोपर्टी डीलर बन बैठे। रही बात मौक पर कब्जा देने की तो कह सकते हैं कि मंगल पर जाओ और देख आओ। कोई अपने प्लॉट पर मकान बनवाने चाहे तो हम बिना ईंट-पत्थर के भी मंगल पर मकान बनवाकर दे सकते हैं। कल्पना के कोई पैसे थोड़े ही लगते हैं, लेकिन कल्पना से पैसा कमाया जा सकता है।
न्यूज टुडे, जयपुर में 11 सिंतबर, 2013 को प्रकाशित व्यंग्य

Wednesday, 4 September 2013

फाइल की कलाबाजी - डॉ. हनुमान गालवा

http://newstoday.epapr.in/155695/Newstoday-Jaipur/04-09-2013#page/5/1

फाइल की कलाबाजी
- डॉ. हनुमान गालवा
कोयला घोटाले की फाइल खो गई। इस पर बवाल ठीक नहीं है। खुद प्रधानमंत्री कह चुके हैं कि इसमें वे क्या कर सकते हैं? दिनभर देश में फाइल इधर-उधर होती रहती है। इसमें कुछ फाइल कहीं अटक जाए या भटक जाए तो भला कोई क्या कर सकता है? इसमें सरकार या चौकसी एजेंसी की क्षमता पर सवाल नहीं उठाया जा सकता है। आप और हमें एक छोटे से कमरे से अपना चश्मा ढूंढऩे में भी पसीना आ जाता है, लेकिन सीबीआई ने हंसते-हंसते भंवरी प्रकरण में नहर से अंगूठी ढूंढ़ लाने का करिश्मा कर दिखाया। ऐसे में सरकार के सामथ्र्य को लेकर भी कोई संशय नहीं होना चाहिए। सरकार बाबाओं को पकड़वाने के लिए घेराबंदी करती है, लेकिन आतंकवादियों का गिरफ्तारी के लिए स्वत: ही चले आने का इंतजार करती है। जो भाग सकता है उसे पकडऩे के लिए भागना बुद्धिमानी नहीं है। बुद्धिमानी इसी में है कि जो भाग नहीं सकता है, उसे पकड़ लो और जो पकड़ में नहीं आ सकता है, उसे पकड़ में आने का इंतजार करो। रही बात फाइल की, तो फाइल तो दूसरी बनाई जा सकती है। फाइल का क्लोन तैयार करने की कला में भी हम पारंगत हैं। जो फाइल दूसरी बनाई जा सकती है तो उसके लिए रोने-धोने की क्या जरूरत? हरवंश राय बच्चन की कविता को अपडेट करके मन को दिलासा दी जा सकती है कि एक फाइल थी। खो गई सो खो गई। खोई हुई फाइलों पर सरकार कब मातम मनाती है...। समझने वाली बात यह है कि फाइलों की गति से ही देश गतिमान है। फाइल चलती है, तो सरकार चलती है। फाइल खोती है, तो सरकार बचती है। खोई हुई फाइल या तो किसी घटक को डराने के लिए मिलती है या फिर किसी मुद्दे पर समर्थन जुटाने के लिए मिलती है। दरसअल, फाइल खोती नहीं है, वह तो केवल अदृश्य होती है। जरूरत के अनुरूप फाइल का प्रकट होना, गायब करना और उधर-उधर होने की कलाबाजी से ही सरकार बनती है, चलती है और बचती है।
न्यूज टुडे जयपुर में 4 सितंबर, 2013 को प्रकाशित व्यंग्य

Sunday, 25 August 2013

जातिवाद का बोलबाला

जातिवाद का बोलबाला

राजस्थान के विभिन्न विश्वविद्यालयों एवं महाविद्यालयों के छात्रसंघ चुनाव परिणामों का सामाजिक एवं राजनीतिक विश्लेषण किया जाए, तो हालात चिंताजनक हंै। चुनावी नतीजों से साफ है कि एक तो छात्र राजनीति पूरी तरह आरक्षित वर्ग के छात्र-छात्राओं तक सिमटती जा रही है, दूसरी बात अनारक्षित वर्ग के विद्यार्थी पूरी तरह हाशिए पर आ गए हैं या आने के कगार पर हैं।

यह स्थिति इसलिए पैदा नहीं हो रही है कि आरक्षित वर्ग के विद्यार्थियों में अचानक राजनीतिक चेतना आ गई है? आरक्षण के राजनीतिकरण के चलते इसके दायरे में ऎसी कई जातियां शामिल कर ली गई, जो सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक रूप में सामान्य वर्ग के समकक्ष थीं। प्रवेश में आरक्षण के रोस्टर के चलते सामान्य वर्ग की सीटों पर भी आरक्षित वर्ग की प्रभावशाली जातियों के विद्यार्थी भर गए। अनारक्षित वर्ग के गिने-चुने विद्यार्थियों का ही सरकारी विश्वविद्यालय या महाविद्यालय में दाखिला हो पा रहा है। आरक्षण की राजनीति में जातिवाद के तड़के ने उच्च शिक्षा के इन केन्द्रों में प्रमुख राजनीतिक दलों के समर्थित छात्र संगठनों की राजनीति में भी संगठन शक्ति को गौण कर दिया।

अब भारतीय विद्यार्थी परिषद हो या एनएसयूआई या फिर एसएफआई, सभी को अपने खाते में जीत दर्ज करवाने के लिए उसी जाति के प्रत्याशी चाहिए, जिस जाति के छात्र मतदाता ज्यादा हैं। विश्वविद्यालय चूंकि लोकतंत्र की पाठशाला माने जाते हैं। यदि इसी पाठशाला में चुनाव जीतने के लिए जातिवाद की तिकड़म आजमाई जाएगी या सिखलाई जाएगी, तो यहां से निकलने वाले युवाओं से लोकतांत्रिक मूल्यों के अनुरूप आचरण की उम्मीद कैसे की जा सकती है? हालात यही रहे और इसी तरह जातिवाद को उकसाते और भुनाते रहे, तो उच्च शिक्षा के ये केन्द्र जातिवादी राजनीति के अखाड़े बनकर रह जाएंगे।

आरक्षण की व्यवस्था के चलते सरकारी विश्वविद्यालय और महाविद्यालय में शिक्षा पाने से अनारक्षित वर्ग के विद्यार्थी वंचित रह रहे हैं, तो क्या यह नहीं सोचा जाना चाहिए वे क्या करेंगे या कहां जाएंगे? राजनीतिक लाभ-हानि से इतर सभी के हित को केन्द्र में रखकर नहीं सोचा जाएगा, तो समाज में नई तरह की विषमताएं पैदा होंगी, जिससे हमारी सामाजिक समरसता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। आरक्षण व्यवस्था पर पुनर्विचार संभव नहीं हो, तो कम से कम इससे पैदा होने वाली समस्याओं और विकृतियों को रोकने के समुचित उपाय तो किए ही जा सकते हैं।

चूंकि राजनीतिक दलों की तरह अब छात्रसंघ चुनाव में प्रत्याशी के चयन से लेकर चुने जाने तक की प्रक्रिया में जातिगत मतों के ध्रुवीकरण, समझौते और समझाइश की कवायद साफतौर पर दिखलाई पड़ रही है, इसलिए अब छात्रसंघ के विभिन्न कार्यक्रमों में भी नेता जातिवाद को उकसाते-भुनाते दिखे को कोई अचरज की बात नहीं। इसी का विकृत रूप हमारी चुनावी राजनीति में दिखता है, तो यह समझने की कोशिश क्यों नहीं करते कि हम अपने ही बोए हुए कांटों का दर्द झेलते हैं। छात्रसंघ के रूप में परिसर में जातिवादी राजनीति अंकुरित होती है, जिसे राजनीतिक दल चुनावी राजनीति में सोशल इंजीनियरिंग, जाति आधारित भाईचारा सम्मेलन और तुष्टीकरण से वटवृक्ष बना देते हैं। इस स्थिति में हम जातिवादी राजनीति को केवल कोस सकते हैं, लेकिन व्यवहार में इसे झेलने, सहने और आगे बढ़ाने को विवश दिखते हैं।

छात्रसंघ से लेकर संसद तक पोषित हो रही धर्म-जाति की राजनीति से निजात पाना बेहद मुश्किल है, लेकिन असंभव कतई नहीं। जातिवादी राजनीति सभी दलों और नेताओं को इसलिए भी सुहाती है, क्योंकि इसमें मुद्दे गौण हो जाते हैं और जातिगत अहंकार हावी हो जाता है। जब बिना मुद्दे ही जातिवाद के आधार पर चुनाव जीता जा सकता है, तो फिर कोई अपनी लोकप्रियता बढ़ाने के लिए मतदाताओं के पास रचनात्मक कार्यक्रम लेकर क्यों जाएगा? चुनाव लड़ने या जीतने का आधार जब जातिवाद रह जाएगा, तो फिर मतदाताओं को लुभाने के लिए किसी ठोस कार्यक्रम की जरूरत क्या? जब प्रत्याशी की कोई नीति नहीं होगी और उसके पास अपना कोई कार्यक्रम नहीं होगा, तो वह चुनाव जीतकर भी व्यवस्था में भला क्या सुधार कर पाएगा और सुधार करेगा भी क्यों? जातिवादी राजनीति का बोलबाला कार्यक्रम, नीति और योजनाओं में भी साफ दिखाई देता है।

इसीलिए छात्रसंघ भी परिसर में शैक्षिक माहौल नहीं लौटा पाता है और हमारे मतों से चुने जाने वाले हमारे नीति-नियंता भी खुशहाल और समृद्ध लोकतांत्रिक समाज का निर्माण कर पाने में विफल रहते हैं।

कहने का तात्पर्य यह है कि केवल चुनाव करवा लेना ही काफी नहीं है। हमें यह भी देखना होगा कि इन चुनावों से हमें हासिल क्या हो रहा है? क्या इन चुनावों से हम ऎसा भावी नेतृत्व तैयार कर पाएंगे, जो चुनौतियों का सामना करके देश और समाज के हितों की रक्षा कर पाने में सक्षम है? छात्रसंघ अध्यक्ष हो, विधायक-सांसद या फिर पंच-सरपंच, हम जातिगत भावना के वशीभूत होकर मतदान करेंगे, तब हमारे जातिवादी अहंकार की तुष्टि तो संभव है, लेकिन हम सक्षम नेतृत्व का चयन कदापि नहीं कर पाएंगे।

सक्षम नेतृत्व के चयन में हमारा मत तभी निर्णायक हो सकता है, जब वोट देते समय हमारी समस्याओं को सुलझाने की उसकी समझ और सामथ्र्य को देखें। यह तभी संभव है, तब हमारे सोचने का दायरा संकीर्ण न हो और हम सभी की भलाई चाहें। मुद्दे आधारित राजनीति का हाशिए पर जाना लोकतंत्र की सेहत के लिए ठीक नहीं है। इसे समझने और लोकशाही को मजबूत बनाने के लिए चेतने और चेताने की जरूरत है।

डॉ. हनुमान गालवा

 http://dailynewsnetwork.epapr.in/152103/Daily-news/26-08-2013#page/7/1
डेली न्यूज, जयपुर में 26 अगस्त, 2013 को प्रकाशित आलेख

Wednesday, 21 August 2013

हम विश्वगुरु जो ठहरे - डॉ. हनुमान गालवा

http://newstoday.epapr.in/150202/Newstoday-Jaipur/21-08-2013#page/5/1

 हम विश्वगुरु जो ठहरे
- डॉ. हनुमान गालवा
आतंकवादियों के बम गुरु को पकड़कर हमने भी साबित कर दिया कि हम भी आखिर विश्वगुरु रहे हैं। हमारी यह उपलब्धि अमेरिका को भी मात देने वाली है। अमेरिका को एक आतंकी सरगना को पकडऩे के लिए विशेष सैन्य कार्रवाई करनी पड़ी। उस कार्रवाई का लाइव प्रसारण वहां के राष्ट्रपति ने देखा। हमारी कार्रवाई का वीडियो देखेंगे तो उनके समझ में आ जाएगा कि आतंकी को पकडऩे के लिए युद्ध करने की जरूरत नहीं है। यह कला सिर्फ हमें ही आती है। हमें पूरा यकीन था कि बम गुरु भारत ही आएगा। ओसामा बिन लादेन ने पाकिस्तान में शरण लेने की जो गलती की थी, उसे वह कतई नहीं दोहराएगा। फिर जब बुढ़ापा सुधारने के लिए भारत आने का उसका खुफिया संदेश पकड़ गया तो हमारा खुफिया तंत्र बेफिक्र हो गया था कि वह यहीं आएगा। उसने हमारे भरोसे को नहीं तोड़ा। उसने भारत भूमि पर प्रवेश किया तो इस उपलब्धि को लपकने के लिए स्पेशल पुलिस की स्पेशल टीम तैयार बैठी थी। उत्साह में हम गिरफ्तारी और किसी वीआईपी की अगवानी में फर्क ही भूल गए। फोटो ऐसे उतार रहे थे, जैसे जिसका फोटो इस बम गुरु के साथ नहीं होगा, उसे इस उपलब्धि के खाते में प्रमोशन नहीं मिलेगा। खैर, यह अच्छी बात रही कि हमारी इस उपलब्धि से नुकसान किसी को नहीं हुआ। जिनके लिए वह बम बनाता था, वह आतंकी संगठन भी उसके बुढ़ापे को देखते हुए उससे किनारा कर चुके थे। वह बेचारा लाहोर की सड़कों पर इत्र बेचकर दिन काट रहा था। अब यहां आ गया तो उसके सब कष्ट मिट जाएंगे। जेल में रहा तो शाही ठाठ और बाहर आ गया तब भी उसके मौज। पांच रुपए में भरपेट भोजन चाहिए तो वह दिल्ली में जमा रह सकता है और खाने के लिए 12 रुपए होंगे तो वह मुंबई का भी मेहमान बन सकता है। एक रुपए में वह भरपेट खाने के साथ कश्मीर की सैर मुफ्त में कर सकता है।
न्यूज टुडे जयपुर में 21 अगस्त, 2013 को प्रकाशित व्यंग्य