Thursday, 8 October 2015
Saturday, 4 April 2015
social media>> hindi vyang>>सोशल मीडिया का समाजवाद - डॉ. हनुमान गालवा
सोशल मीडिया का समाजवाद
- डॉ. हनुमान गालवा
फेसबुक पर गुरु जी की आई फ्रेंड रिक्वेस्ट ने मेरी दुविधा बढ़ा दी। रिक्वेस्ट कन्फर्म करता तो गुरु जी मेरे फ्रेंड हो जाते और कन्फर्म नहीं करता गुरु-शिष्य संबंधों में खटास आ जाने का अंदेशा बना रहता। जब कोई विकल्प नहीं दिखा तो मैंने गुरु जी की फ्रेंड रिक्वेस्ट पर कन्फर्म ऑप्शन पर क्लिक कर दिया। अब फेसबुक पर गुरु जी फ्रेंड बन गए हैं। फेसबुक ने गुरु-शिष्य ही नहीं, बल्कि तमाम रिश्तों को समतल कर दिया। अब फेसबुक पर बेटा, पत्नी, बहन-भाई, माता-पिता या गुरु-शिष्य सभी के सभी फ्रेंड हैं। सोशल मीडिया की चौपाल पर आकर रिश्ते अपने आप समतल हो जाते हैं। रिश्तों का यह एकीकरण ही असल में समाजवाद है।
वैसे भी समाजवाद अब केवल सोशल मीडिया पर बचा है। चूंकि धरती पर समाजवाद मुलायमवाद में कनवर्ट हो चुका है। लिहाजा सोशल मीडिया के समाजवाद से ही कुछ उम्मीदें बची हैं। सोशल मीडिया के समाजवाद ने रिश्तों के झंझट से पूरी तरह मुक्ति दिला दी है। दरअसल, रिश्तों की टेंशन ही समाजवाद की राह में सबसे बड़ा रोड़ा है। इस रोड़े को सोशल मीडिया की चौपाल ने दूर कर दिया है तो उम्मीद की जानी चाहिए कि समाजवाद के अच्छे दिन आने वाले हैं। आज रिश्ते समतल हुए हैं, तो कल हमारे संकट भी समतल होंगे। लाइक-अनलाइक के ऑप्शन की तरह जीवन में भी दो ही ऑप्शन बचेंगे- हैप्पी और अनहैप्पी। इन ऑप्शन को शेयर करके अपने फ्रेंड के लाइक-अनलाइक के तराजू पर अपनी पीड़ा तौलकर दिल को कुछ तसल्ली दी जा सकती है। सोशल मीडिया ने जिस तरह तमाम सामाजिक-धार्मिक रिश्तों को समेटकर एक ही रिश्ते (फ्रेंड) में परिवर्तित कर दिया है, तो क्या इसी तर्ज पर समस्याओं के पिटारे को समेटा नहीं जा सकता है? स्कूलों का एकीकरण हो रहा है, दलों का विलीनीकरण हो रहा है तो समस्याओं का समानीकरण क्यों नहीं होना चाहिए? योजना आयोग के वास्तु दोष के निवारण के लिए नाम बदलकर नीति आयोग बनाया गया। अब विश्वविद्यालय अनुदान आयोग में वास्तुदोष दिखने लगा है, तो उसके निवारण के उपाय तलाशे जाने लगे हैं। इन तमाम आयोगों को भी सोशल मीडिया के समाजवाद की चक्की में डालकर एक ही प्रॉडक्ट बनाया जा सकता है। इस प्रॉडक्ट को लाइक-अनलाइक के मानदंडों के आधार पर अच्छे दिनों के अनुमान का मास्टर प्लान तैयार किया जा सकता है।
डेली न्यूज जयपुर में 4 अप्रेल, 2015 को प्रकाशित व्यंग्य - सोशल मीडिया का समाजवाद
http://dailynewsnetwork.epapr.in/472381/Daily-news/04-04-2015#page/6/2 http://dailynewsnetwork.epapr.in/472381/Daily-news/04-04-2015#page/6/2
फेसबुक पर गुरु जी की आई फ्रेंड रिक्वेस्ट ने मेरी दुविधा बढ़ा दी। रिक्वेस्ट कन्फर्म करता तो गुरु जी मेरे फ्रेंड हो जाते और कन्फर्म नहीं करता गुरु-शिष्य संबंधों में खटास आ जाने का अंदेशा बना रहता। जब कोई विकल्प नहीं दिखा तो मैंने गुरु जी की फ्रेंड रिक्वेस्ट पर कन्फर्म ऑप्शन पर क्लिक कर दिया। अब फेसबुक पर गुरु जी फ्रेंड बन गए हैं। फेसबुक ने गुरु-शिष्य ही नहीं, बल्कि तमाम रिश्तों को समतल कर दिया। अब फेसबुक पर बेटा, पत्नी, बहन-भाई, माता-पिता या गुरु-शिष्य सभी के सभी फ्रेंड हैं। सोशल मीडिया की चौपाल पर आकर रिश्ते अपने आप समतल हो जाते हैं। रिश्तों का यह एकीकरण ही असल में समाजवाद है।
वैसे भी समाजवाद अब केवल सोशल मीडिया पर बचा है। चूंकि धरती पर समाजवाद मुलायमवाद में कनवर्ट हो चुका है। लिहाजा सोशल मीडिया के समाजवाद से ही कुछ उम्मीदें बची हैं। सोशल मीडिया के समाजवाद ने रिश्तों के झंझट से पूरी तरह मुक्ति दिला दी है। दरअसल, रिश्तों की टेंशन ही समाजवाद की राह में सबसे बड़ा रोड़ा है। इस रोड़े को सोशल मीडिया की चौपाल ने दूर कर दिया है तो उम्मीद की जानी चाहिए कि समाजवाद के अच्छे दिन आने वाले हैं। आज रिश्ते समतल हुए हैं, तो कल हमारे संकट भी समतल होंगे। लाइक-अनलाइक के ऑप्शन की तरह जीवन में भी दो ही ऑप्शन बचेंगे- हैप्पी और अनहैप्पी। इन ऑप्शन को शेयर करके अपने फ्रेंड के लाइक-अनलाइक के तराजू पर अपनी पीड़ा तौलकर दिल को कुछ तसल्ली दी जा सकती है। सोशल मीडिया ने जिस तरह तमाम सामाजिक-धार्मिक रिश्तों को समेटकर एक ही रिश्ते (फ्रेंड) में परिवर्तित कर दिया है, तो क्या इसी तर्ज पर समस्याओं के पिटारे को समेटा नहीं जा सकता है? स्कूलों का एकीकरण हो रहा है, दलों का विलीनीकरण हो रहा है तो समस्याओं का समानीकरण क्यों नहीं होना चाहिए? योजना आयोग के वास्तु दोष के निवारण के लिए नाम बदलकर नीति आयोग बनाया गया। अब विश्वविद्यालय अनुदान आयोग में वास्तुदोष दिखने लगा है, तो उसके निवारण के उपाय तलाशे जाने लगे हैं। इन तमाम आयोगों को भी सोशल मीडिया के समाजवाद की चक्की में डालकर एक ही प्रॉडक्ट बनाया जा सकता है। इस प्रॉडक्ट को लाइक-अनलाइक के मानदंडों के आधार पर अच्छे दिनों के अनुमान का मास्टर प्लान तैयार किया जा सकता है।
डेली न्यूज जयपुर में 4 अप्रेल, 2015 को प्रकाशित व्यंग्य - सोशल मीडिया का समाजवाद
http://dailynewsnetwork.epapr.in/472381/Daily-news/04-04-2015#page/6/2 http://dailynewsnetwork.epapr.in/472381/Daily-news/04-04-2015#page/6/2
Wednesday, 25 February 2015
pm modi suit controversy and auction hindi vyang नीलामी का समर्थन मूल्य और महंगाई डॉ. हनुमान गालवा
नीलामी का समर्थन मूल्य और महंगाई
- डॉ. हनुमान गालवा
नसीबजादे के कपड़ों की नायाब नीलामी ने अच्छे दिनों की उम्मीद के पंख लगा दिए हैं। महंगाई डायन के कहर से तार-तार हो चुके कपड़ों से अच्छे दिनों की उम्मीद बाहर झांकने को बेताब है। पीपली लाइव की पटकथा भी नसीबजादे के कपड़ों की नीलामी के बाद लिखी जाती, तो नाथा को अपना कर्ज चुकाने के लिए जान देने का प्लान नहीं बनाना पड़ता। वह भी अपने तन पर लटक रहे कपड़ों के अवशेषों की नीलामी से अपना जीवन बचाकर गंगा में डुबकी लगा सकता था, लेकिन अच्छे दिन शायद उसके नसीब में नहीं थे। अब अच्छे दिनों की सरकार है, तो पीपली लाइव के जो नाथा महंगाई डायन से अब तक बचे हुए हैं, उनके जीवन को कपड़ों की नीलामी से बचाया जा सकता है।
नीलामी का राष्ट्रव्यापी कार्यक्रम घोषित करके लोगों को अच्छे दिनों की अनुभूति का अहसास करवाया जा सकता है। गुणीजन कह सकते हैं कि नसीबवाले के कपड़ों की नीलामी तो निवेश है, लेकिन गरीबों के कपड़े खरीद कर कोई खुद गरीब क्यों बनना चाहेगा? बात तो सोलह आना खरी है, लेकिन सरकार नीलामी का न्यूनतम समर्थन मूल्य घोषित करके अच्छे दिनों का लुक दे सकती है। सरकार चाहे, तो चीथड़े और कपड़े की नीलामी का समर्थन मूल्य अलग-अलग घोषित कर सकती है, ताकि सरकार पर भेदभाव का कोई आरोप नहीं लगे। सरकार चाहे तो नीलामी में अपने तन के कपड़े बेचने वालों के लिए आधार कार्ड की अनिवार्यता कर सकती है, ताकि नीलामी में कोई फर्जीवाड़े होने की कोई आशंका नहीं रहे। सरकार चाहे तो प्रधानमंत्री जनधन योजना का खाता संख्या लेकर कपड़ों की संख्या के आधार पर समर्थन मूल्य सीधे खाते में जमा करवा सकती है। नीलामी का यह सरकारी कार्यक्रम भी गिनीज बुक में दुनिया के सबसे बड़े नीलामी कार्यकम के रूप में दर्ज हो सकता है। इस नीलामी कार्यक्रम को आकर्षक बनाने के लिए बोली लगाने वालों को विशेष बोनस भी ऑफर किया जा सकता है। मसलन, जो न्यूनतम समर्थन मूल्य से ज्यादा बोली लगाएगा, उसे सरकारी काम-काज के ठेके में वरीयता दी जाएगी। कर्ज माफी योजनाओं को भी नीलामी के इस कार्यक्रम से लिंकअप किया जा सकता है कि तन के सारे कपड़े नीलामी करने वालों को सरकार कपड़े खरीदने के लिए कर्ज देगी, लेकिन खरीदे हुए कपड़े नीलाम होने पर ही ऋण माफी प्रदान की जाएगी।
डेली न्यूज, जयपुर में 26 फरवरी, 2015 को प्रकाशित व्यंग्य- नीलामी का समर्थन मूल्य और महंगाई
http://dailynewsnetwork.epapr.in/c/4596576
- डॉ. हनुमान गालवा
नसीबजादे के कपड़ों की नायाब नीलामी ने अच्छे दिनों की उम्मीद के पंख लगा दिए हैं। महंगाई डायन के कहर से तार-तार हो चुके कपड़ों से अच्छे दिनों की उम्मीद बाहर झांकने को बेताब है। पीपली लाइव की पटकथा भी नसीबजादे के कपड़ों की नीलामी के बाद लिखी जाती, तो नाथा को अपना कर्ज चुकाने के लिए जान देने का प्लान नहीं बनाना पड़ता। वह भी अपने तन पर लटक रहे कपड़ों के अवशेषों की नीलामी से अपना जीवन बचाकर गंगा में डुबकी लगा सकता था, लेकिन अच्छे दिन शायद उसके नसीब में नहीं थे। अब अच्छे दिनों की सरकार है, तो पीपली लाइव के जो नाथा महंगाई डायन से अब तक बचे हुए हैं, उनके जीवन को कपड़ों की नीलामी से बचाया जा सकता है।
नीलामी का राष्ट्रव्यापी कार्यक्रम घोषित करके लोगों को अच्छे दिनों की अनुभूति का अहसास करवाया जा सकता है। गुणीजन कह सकते हैं कि नसीबवाले के कपड़ों की नीलामी तो निवेश है, लेकिन गरीबों के कपड़े खरीद कर कोई खुद गरीब क्यों बनना चाहेगा? बात तो सोलह आना खरी है, लेकिन सरकार नीलामी का न्यूनतम समर्थन मूल्य घोषित करके अच्छे दिनों का लुक दे सकती है। सरकार चाहे, तो चीथड़े और कपड़े की नीलामी का समर्थन मूल्य अलग-अलग घोषित कर सकती है, ताकि सरकार पर भेदभाव का कोई आरोप नहीं लगे। सरकार चाहे तो नीलामी में अपने तन के कपड़े बेचने वालों के लिए आधार कार्ड की अनिवार्यता कर सकती है, ताकि नीलामी में कोई फर्जीवाड़े होने की कोई आशंका नहीं रहे। सरकार चाहे तो प्रधानमंत्री जनधन योजना का खाता संख्या लेकर कपड़ों की संख्या के आधार पर समर्थन मूल्य सीधे खाते में जमा करवा सकती है। नीलामी का यह सरकारी कार्यक्रम भी गिनीज बुक में दुनिया के सबसे बड़े नीलामी कार्यकम के रूप में दर्ज हो सकता है। इस नीलामी कार्यक्रम को आकर्षक बनाने के लिए बोली लगाने वालों को विशेष बोनस भी ऑफर किया जा सकता है। मसलन, जो न्यूनतम समर्थन मूल्य से ज्यादा बोली लगाएगा, उसे सरकारी काम-काज के ठेके में वरीयता दी जाएगी। कर्ज माफी योजनाओं को भी नीलामी के इस कार्यक्रम से लिंकअप किया जा सकता है कि तन के सारे कपड़े नीलामी करने वालों को सरकार कपड़े खरीदने के लिए कर्ज देगी, लेकिन खरीदे हुए कपड़े नीलाम होने पर ही ऋण माफी प्रदान की जाएगी।
डेली न्यूज, जयपुर में 26 फरवरी, 2015 को प्रकाशित व्यंग्य- नीलामी का समर्थन मूल्य और महंगाई
http://dailynewsnetwork.epapr.in/c/4596576
Sunday, 18 January 2015
सरपंच पद का फैमिली पैक sarpanch pad ka family pack
http://d2na0fb6srbte6.cloudfront.net/read/imageapi/clipimage/420381/50a50d06-0006-42f0-acd8-1578958e89fehttp://d2na0fb6srbte6.cloudfront.net/read/imageapi/clipimage/420381/50a50d06-0006-42f0-acd8-1578958e89fe
सरपंच पद का फैमिली पैक
डॉ. हनुमान गालवा
आठवीं पास के अड़ंगे ने महिलाओं के लिए आरक्षित सरपंच पद को एसपी यानी सरपंच पति के प्रभाव से मुक्ति दिला दी है। इसे महिला सशक्तीकरण का नया आयाम माना जा सकता है। आठवीं पास नई बीनणी को सरपंच पद का प्रत्याशी बनाया, तो उसके साथ सरपंचाई का पैनल स्वत: ही जुड़ गया। पहले महिला के लिए आरक्षित सरपंच पद की प्रत्याशी के पति को स्वाभाविक रूप से अनिर्वाचित सरपंच मान लिया जाता था। अब सरपंच पद पत्नी-पति के जोड़े प्रभाव से बाहर निकलकर फैमिली पैक में तब्दील हो गया है। सरपंच और सरपंचाई के पैनल में अब पत्नी-पति के जोड़े के दिन लद चुके हैं।
अब बहू-ससुर, भाभी-देवर, बहू-जेठ, बेटी-बाप, पोती-दादा....आदि कई प्रभावशाली विशेषण जुड़ गए हैं, जो निर्वाचित सरपंच की भूमिका को कागजी कार्रवाई तक समेटकर खुद सरपंचाई करेंगे। सरंपचाई के इस फैमिली पैक ने महिला सशक्तीकरण के साथ शब्दावली को भी विस्तार दिया है। पहले एसपी यानी सरपंच पति होते थे। अब सरपंच ससुर, सरपंच देवर, सरपंच जेठ, सरपंच दादा, सरपंच पिता, सरपंच काका नए शब्द प्रचलन में आ गए। शब्दकोश का विस्तार हो रहा है तो उम्मीद की जानी चाहिए कि महिलाओं की ताकत भी बढ़ेगी। सरपंचाई का प्रसाद पति परमेश्वर से बंटते-बंटते पूरे परिवार में बंटने लगा है, तो स्वीकारा जाना चाहिए कि नारी शक्ति का प्रभाव विस्तार पा रहा है। पहले महिला सरपंच चुनी जाती थी, तो केवल पति का महिमामंडन होता था। अब चुनी हुई महिला सरपंच पूरे परिवार के प्रभाव को प्रतिष्ठित करेगी। सरपंच-पति के प्रभाव से सरपंच पद को निजात दिलाने से जो फैमिली पैक सामने आया है, उससे लोकतंत्र में सामूहिक नेतृत्व की स्वीकार्यता बढ़ेगी। इससेे लोकतंत्र का नेटवर्क स्वत: ही अपनी आदर्श स्थिति से कनेक्ट हो जाएगा। पहले महिला सरपंच जीतती थी, तब केवल पति परमेश्वर के अच्छे दिन आते थे। अब पढ़ी-लिखी नई बीनणी सरपंच बनेगी, तो पूरे परिवार के अच्छे दिन आएंगे। गांव में सरपंचाई से किसी एक पूरे परिवार के अच्छे दिन आएंगे, तो उम्मीद की जानी चाहिए कि पूरे गांव के अच्छे दिन आने में भी अब कोई ज्यादा विलंब नहीं होगा। सरकार ने पति का आधिपत्य तोडऩे के लिए आठवीं पास का पास फेंका, लेकिन इस पासे को फैमिली पैक में तब्दील करके सरपंचाई पर पूरे परिवार का आधिपत्य स्थापित कर दिया।
डेली न्यूज, जयपुर में 19 जनवरी, 2015 प्रकाशित व्यंग्य- सरपंच पद का फैमिली पैक
Tuesday, 4 November 2014
अच्छे दिन>>>रेल यात्रियों के अच्छे दिन- डॉ. हनुमान गालवा
रेल यात्रियों के अच्छे दिन
डॉ. हनुमान गालवा
लगता है कि रेल यात्रियों के अच्छे दिन आ गए हैं। जिनके खाते में रेलगाड़ी का टिकिट खरीदने के लिए पर्याप्त बैलेंस नहीं हैं, उनको भी अब चिंता करने की कोई जरूरत नहीं है। रेलगाड़ी का टिकिट खरीदने पर भी आकर्षक ईएमआई पर फाइनेंस उपलब्ध है। आपके खाते में जितने रुपए हों, आप ऑनलाइन रेलवे को अर्पित कर दीजिए, टिकिट की शेष राशि आसान किश्तों में चुकाते रहिए। अब रेलगाड़ी में यात्रा करने के लिए आपको अपने अकाउंट का बैलेंस देखने की जरूरत नहीं है। यानी खाता खाली हो, तब भी टिकिट का बंदोबस्त हो सकता है। जब किश्तों पर टिकिट का बंदोबस्त हो जाए तो स्वाभाविक है कि रेलगाड़ी में आप चैन की नींद सो सकते हैं।
आपकी इस चिंता का बोझ भी रेलवे अपने ऊपर ले रहा है कि गहरी निद्रा में आपका गंतव्य स्टेशन कहीं पीछे नहीं छूट जाए। आपके मोबाइल पर तय समय पर रेलवे अलार्म बजाकर आपको अलर्ट कर देगा कि आपकी गाड़ी निर्धारित समय से पंद्रह मिनट विलंब से गंतव्य स्टेशन पर पहुंचने की संभावना है। इस संभावना के अनुरूप अपनी नींद को विस्तार देकर खर्राटे ले सकेंगे। अब जब रेलगाड़ी का टिकिट खरीदने पर भी फाइनेंस की जरूरत समझी जा रही है तो रेलवे स्टेशन पर चाय पीने या रेलवे कैंटीन में भोजन-नाश्ते के लिए भी आकर्षक किश्तों में फाइनेंस को पीपीपी मॉडल से जन कल्याणकारी बनाया जा सकता है। सरकार चाहे तो रेलवे की उधारी नहीं चुकाने वालों को माफ करके अपनी छवि लोक कल्याणकारी बना सकती है। महंगाई से राहत का यह नायाब नुस्खा रेलवे में कारगर रहे, तो इसे प्राइवेट स्कूल, सब्जी मंडी से लेकर किराना स्टोर तक आजमाया जा सकता है। सरकार चाहे तो इस पर सब्सिडी सीधे खाते में भी जमा करवा सकती है या फिर सीधे फाइनेंस कम्पनियों को भी दी जा सकती है। सरकार चाहे, तो महंगाई से राहत के इन प्रयासों को प्रभावी बनाने के लिए प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) की राह भी खोल सकती है। विदेशी निवेश यदि स्वदेशी पसंद सरकार को नहीं जच रहा है तो विदेशी बैंकों में जमा स्वदेशी धन के देश में आने तक राहत के फाइनेंस की किश्तें चुकाने से छूट दी जा सकती है। जब काला धन स्वदेश आकर गंगाजल से पवित्र हो जाए तो उससे आम आदमी का बकाया चुका कर स्थाई राहत दी जा सकती है। http://dailynewsnetwork.epapr.in/c/3768277
http://dailynewsnetwork.epapr.in/c/3768277
डेली न्यूज में 5 नवंबर, 2014 को प्रकाशित व्यंग्य— रेल यात्रियों के अच्छे दिन
डॉ. हनुमान गालवा
लगता है कि रेल यात्रियों के अच्छे दिन आ गए हैं। जिनके खाते में रेलगाड़ी का टिकिट खरीदने के लिए पर्याप्त बैलेंस नहीं हैं, उनको भी अब चिंता करने की कोई जरूरत नहीं है। रेलगाड़ी का टिकिट खरीदने पर भी आकर्षक ईएमआई पर फाइनेंस उपलब्ध है। आपके खाते में जितने रुपए हों, आप ऑनलाइन रेलवे को अर्पित कर दीजिए, टिकिट की शेष राशि आसान किश्तों में चुकाते रहिए। अब रेलगाड़ी में यात्रा करने के लिए आपको अपने अकाउंट का बैलेंस देखने की जरूरत नहीं है। यानी खाता खाली हो, तब भी टिकिट का बंदोबस्त हो सकता है। जब किश्तों पर टिकिट का बंदोबस्त हो जाए तो स्वाभाविक है कि रेलगाड़ी में आप चैन की नींद सो सकते हैं।
आपकी इस चिंता का बोझ भी रेलवे अपने ऊपर ले रहा है कि गहरी निद्रा में आपका गंतव्य स्टेशन कहीं पीछे नहीं छूट जाए। आपके मोबाइल पर तय समय पर रेलवे अलार्म बजाकर आपको अलर्ट कर देगा कि आपकी गाड़ी निर्धारित समय से पंद्रह मिनट विलंब से गंतव्य स्टेशन पर पहुंचने की संभावना है। इस संभावना के अनुरूप अपनी नींद को विस्तार देकर खर्राटे ले सकेंगे। अब जब रेलगाड़ी का टिकिट खरीदने पर भी फाइनेंस की जरूरत समझी जा रही है तो रेलवे स्टेशन पर चाय पीने या रेलवे कैंटीन में भोजन-नाश्ते के लिए भी आकर्षक किश्तों में फाइनेंस को पीपीपी मॉडल से जन कल्याणकारी बनाया जा सकता है। सरकार चाहे तो रेलवे की उधारी नहीं चुकाने वालों को माफ करके अपनी छवि लोक कल्याणकारी बना सकती है। महंगाई से राहत का यह नायाब नुस्खा रेलवे में कारगर रहे, तो इसे प्राइवेट स्कूल, सब्जी मंडी से लेकर किराना स्टोर तक आजमाया जा सकता है। सरकार चाहे तो इस पर सब्सिडी सीधे खाते में भी जमा करवा सकती है या फिर सीधे फाइनेंस कम्पनियों को भी दी जा सकती है। सरकार चाहे, तो महंगाई से राहत के इन प्रयासों को प्रभावी बनाने के लिए प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) की राह भी खोल सकती है। विदेशी निवेश यदि स्वदेशी पसंद सरकार को नहीं जच रहा है तो विदेशी बैंकों में जमा स्वदेशी धन के देश में आने तक राहत के फाइनेंस की किश्तें चुकाने से छूट दी जा सकती है। जब काला धन स्वदेश आकर गंगाजल से पवित्र हो जाए तो उससे आम आदमी का बकाया चुका कर स्थाई राहत दी जा सकती है। http://dailynewsnetwork.epapr.in/c/3768277
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डेली न्यूज में 5 नवंबर, 2014 को प्रकाशित व्यंग्य— रेल यात्रियों के अच्छे दिन
Wednesday, 6 August 2014
kashmir vivad
सरकारी दस्तावेजों से जम्मू एवं कश्मीर गायब
http://dailynewsnetwork.epapr.in/c/3279793http://dailynewsnetwork.epapr.in/c/3279793
जम्मू एवं कश्मीर को समूचा देश भले ही भारत का अभिन्न अंग माने, लेकिन नागौर जिले की मूंडवा पंचायत समिति के सरकारी दस्तावेजों में जम्मू एवं कश्मीर भारत का हिस्सा नहीं है। दुखद बात यह है कि अधिकारी इस चूक को भी अपनी मनमानी को जायज ठहराने के लिए कुतर्क के रूप में इस्तेमाल कर रहे हैं।
मूंडवा पंचायत समिति के भटनोखा गांव में आम रास्ते पर सरपंच के अतिक्रमण की जांच में सामने आए 1962 के पट्टों में भारत के मानचित्र से छेड़छाड़ सामने आई है। उल्लेखनीय है कि लोकसभा चुनाव की आचार संहिता के दौरान 8 मार्च, 2014 को भटनोखा गांव में सरपंच परिवार की ओर से आम रास्ता रोक देने की शिकायत पर जिला कलेक्टर ने 11 मार्च, 2014 को जांच के आदेश दिए थे। बीडीओ ने तत्काल निर्माण कार्य रुकवा कर जांच के लिए एक समिति गठित कर दी थी। समिति आम रास्ते के आस-पास के बाड़ों के मालिकों से पट्टे पेश करने को कहा। पट्टे देखकर एकबारगी सभी हैरान रह गए। ग्राम पंचायत ग्वालू की ओर से 1962 में जारी किए गए इन पट्टों पर भारत का नक्शा बना बना हुआ है, जिसमें जम्मू एवं कश्मीर का तकरीबन पूरा हिस्सा गायब है। गांव के एक युवक ने अधिकारियों का इस चूक की ओर ध्यान दिलाया तो उस समय तो अधिकारी मुस्कुरा कर रह गए, लेकिन 4 अगस्त, 2014 को आम रास्ते को ही नकारते हुए कह दिया कि पहले के अधिकारियों को देश के मानचित्र में जम्मू एवं कश्मीर ही नहीं दिखा तो हमें आम रास्ता कैसे दिख सकता है? नाडी, स्कूल तथा श्मशान जाने का आम रास्ता बचाने की कोशिश में जुटे ग्रामीण बीडीओ तथा तहसीलदार कार्यालय जाकर दस्तावेज दिखाकर अनुनय-विनय कर रहे हैं कि सरपंच श्याम सिंह के बाड़े के पूर्व तथा परसराम के पश्चिम में इन्हीं पट्टों में आम रास्ता दर्ज है तो फिर आम रास्ता कहां गया? अधिकारी उनका उपहास उड़ा रहे हैं कि नक्शे में जम्मू-कश्मीर आएगा, तो आपका भी आम रास्ता खुलवा दिया जाएगा।
http://dailynewsnetwork.epapr.in/c/3279793http://dailynewsnetwork.epapr.in/c/3279793
जम्मू एवं कश्मीर को समूचा देश भले ही भारत का अभिन्न अंग माने, लेकिन नागौर जिले की मूंडवा पंचायत समिति के सरकारी दस्तावेजों में जम्मू एवं कश्मीर भारत का हिस्सा नहीं है। दुखद बात यह है कि अधिकारी इस चूक को भी अपनी मनमानी को जायज ठहराने के लिए कुतर्क के रूप में इस्तेमाल कर रहे हैं।
मूंडवा पंचायत समिति के भटनोखा गांव में आम रास्ते पर सरपंच के अतिक्रमण की जांच में सामने आए 1962 के पट्टों में भारत के मानचित्र से छेड़छाड़ सामने आई है। उल्लेखनीय है कि लोकसभा चुनाव की आचार संहिता के दौरान 8 मार्च, 2014 को भटनोखा गांव में सरपंच परिवार की ओर से आम रास्ता रोक देने की शिकायत पर जिला कलेक्टर ने 11 मार्च, 2014 को जांच के आदेश दिए थे। बीडीओ ने तत्काल निर्माण कार्य रुकवा कर जांच के लिए एक समिति गठित कर दी थी। समिति आम रास्ते के आस-पास के बाड़ों के मालिकों से पट्टे पेश करने को कहा। पट्टे देखकर एकबारगी सभी हैरान रह गए। ग्राम पंचायत ग्वालू की ओर से 1962 में जारी किए गए इन पट्टों पर भारत का नक्शा बना बना हुआ है, जिसमें जम्मू एवं कश्मीर का तकरीबन पूरा हिस्सा गायब है। गांव के एक युवक ने अधिकारियों का इस चूक की ओर ध्यान दिलाया तो उस समय तो अधिकारी मुस्कुरा कर रह गए, लेकिन 4 अगस्त, 2014 को आम रास्ते को ही नकारते हुए कह दिया कि पहले के अधिकारियों को देश के मानचित्र में जम्मू एवं कश्मीर ही नहीं दिखा तो हमें आम रास्ता कैसे दिख सकता है? नाडी, स्कूल तथा श्मशान जाने का आम रास्ता बचाने की कोशिश में जुटे ग्रामीण बीडीओ तथा तहसीलदार कार्यालय जाकर दस्तावेज दिखाकर अनुनय-विनय कर रहे हैं कि सरपंच श्याम सिंह के बाड़े के पूर्व तथा परसराम के पश्चिम में इन्हीं पट्टों में आम रास्ता दर्ज है तो फिर आम रास्ता कहां गया? अधिकारी उनका उपहास उड़ा रहे हैं कि नक्शे में जम्मू-कश्मीर आएगा, तो आपका भी आम रास्ता खुलवा दिया जाएगा।
Wednesday, 30 July 2014
सीता के अच्छे दिन कब आएंगे - डॉ. हनुमान गालवा
http://dailynewsnetwork.epapr.in/c/3243871
सीता के अच्छे दिन कब आएंगे
- डॉ. हनुमान गालवा
यह अजीब बात है कि सीता के न तो रामराज्य में अच्छे दिन रहे और न ही अच्छे दिनों की सरकार में अच्छे दिन आ पा रहे हैं। अपहरण के बाद सीता के अच्छे दिन लाने के लिए युद्ध हुआ। युद्ध में सीता का अपहरण करने वाले रावण का अंत हुआ, तब उम्मीद जगी कि सीता के अच्छे दिन आने वाले हैं। उस समय सीता के अच्छे दिन लंका विजय के बाद आ गए, लेकिन धोबी को उनके अच्छे दिन रास नहीं आए। धोबी से रामराज्य का प्रमाण पत्र लेने के लिए सीता के अच्छे दिनों को कुर्बान कर दिया गया।
अब चुनाव से अच्छे दिनों की सरकार निकली, तो फिर उम्मीद जगी कि सभी के अच्छे दिन आएंगे तो सीता यानी हर बाला भी अच्छे दिनों से वंचित नहीं रहेगी। रामनाम जपते-जपते सत्ता का सत्तू खाते-खाते डकार लेने लगे कि रामराज्य में ही सीता के अच्छे दिन नहीं रहे, तो हम उनके अच्छे दिन कैसे ला सकते हैं। राम और कृष्ण की जन्मभूमि पर शासन करने वाले यदुवंशी शासक भी हाथ खड़े करने लगे हैं कि भगवान भी 'दुष्कर्मलीलाÓ नहीं रोक सकते हैं। उस जमाने में तो एक रावण था, लेकिन अब तो हर गली-कूचे में रावण घात लगाए बैठा है। घर, बस, ट्रेन, स्कूल, कॉलेज या दफ्तर में रावण कब-किसके डील आ जाए, किसी को पता नहीं चलता। उस रावण के तो केवल दस सिर थे, लेकिन अब रावण चाहे जिसके सिर में जब चाहे प्रविष्ट हो सकता है। चाहे जिसके सिर में प्रकट होने की विशिष्टता का लिंक चुनावी राजनीति से सीधे जुड़ जाने से रावण का मुकाबला करते-करते राजनेताओं के सिर में भी रावण का वायरस घुस जाता है। मायावी रावण का हाईटैक वर्जन उस रावण से कई गुना ज्यादा खतरनाक और मायावी है। अच्छे दिनों की सरकार में बैठे लोग इस उधेड़बुन में है कि लोगों के अच्छे दिन लाएं या फिर खुद के अच्छे दिन बचाएं। गुणीजन कह रहे हैं कि धोबी को रामराज्य का अहसास करने के लिए प्रभु भी सीता के अच्छे दिन कुर्बान करने से नहीं हिचके तो राम नाम के सहारे अच्छे दिनों तक पहुंचने वाले अपने अच्छे दिनों के लिए दूसरों के अच्छे दिनों को कुर्बान क्यों नहीं करें? सीता रामराज्य में भी ठगा हुआ महसूस कर रही थी और लोकशाही में भी ठगा हुआ महससू कर रही है कि उसके अच्छे दिनों से किसी को क्या पीड़ा? अब देखना यह है कि अच्छे दिनों की सरकार रामराज्य को किसके अच्छे दिनों की कुर्बानी से प्रमाणित करती है।
डेली न्यूज में 29 जुलाई 2014 को प्रकाशित व्यंग्य
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