Sunday, 6 July 2014

लापता विमान और सीबीआई

न्यूज टुडे, जयपुर में 2 जुलाई, 2014 को प्रकाशित व्यंग्य - लापता विमान और सीबीआई
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किस करवट बैठेगा ऊंट डॉ. हनुमान गालवा

किस करवट बैठेगा ऊंट
डॉ. हनुमान गालवा
सरकारीकरण के बाद ऊंट समझ नहीं पा रहा है कि उसके अच्छे दिन आने वाले हैं या फिर उसके जैसे-तैसे दिनों की भी विदाई का यह सरकारी घोषणा पत्र है। सरकारीकरण के बाद ऊंट अब किस करवट बैठेगा? करवट को लेकर कयास अपनी जगह है, लेकिन ऊंट की सरकारीकरण के बाद चिंता बढ़ गई है कि यह करवट बचेगी भी या नहीं? उसकी यह चिंता निराधार इसलिए भी नहीं है, क्योंकि गोडावण राज्यपक्षी घोषित होने के बाद दहाई में सिमट चुका है। राज्यपशु चिंकारा चौकड़ी भर रहा है, लेकिन राज्य पुष्प रोहिड़े का फूल दूरबीन से ढूंढऩे पर भी भाग्यशाली को ही दिख पाता है। राज्य पेड़ खेजड़ी अपने गौरवशाली अतीत को याद करके रो रही है तो पीने के पानी की सरकारी पाइप लाइन से वीरान हुआ पनघट विलाप करने को विवश है। सरकारीकरण के चलते शहर भी दैत्य बन गए और गांवों को गटकते जा रहे हैं। चिंता का एक कारण यह भी है कि क्या ऊंट को अब सरकार बदलने के साथ बदलनी पड़ेगी या फिर उसे अपने हिसाब से करवट बदलने की आजादी बरकरार रहेगी?
करवट तो केवल गठबंधन सरकार में बदली जा सकती है। प्रचंड बहुमत की सरकार में तो करवट बदलने की आहट मात्र से अपनों को भी अपने पलक झपकते ही खंडहर में तब्दील कर देते हैं, धरोहर घोषित कर देते हैं। ऐसे में सरकार बदलने के साथ ऊंट भी अपनी करवट बदलने लगेगा तो फिर वह ऊंट कैसे रह पाएगा? उसका 'ऊंटपनाÓ ही जाता रहेगा तो फिर तो ऊंट और सत्ता के रंग में रंग जाने वाले नौकरशाह में फर्क ही क्या रह जाएगा? जब ऊंट की करवट का सरकारीकरण हो जाएगा तो फिर कोई भी बता सकता है कि ऊंट किस करवट बैठेगा या किस करवट बैठने वाला है? इससे एक फायदा जरूर होगा कि ऊंट की करवट के रुख को देखकर यह अंदाज आसानी से लगाया जा सकेगा कि चुनाव में सरकार बचेगी या वीरगति को प्राप्त होगी? एग्जिटपोल में भी ऊंट की करवट को शामिल करके उसे विश्वसनीय बनाया जा सकता है कि ऊंट करवट बदल रहा है यानी सरकार के पक्ष में जनादेश नहीं है...ऊंट के करवट बदलने का मन नहीं बनाने का मलतब है कि सरकार की सुरक्षित वापसी तय है। ऊंट की करवट के विशेषज्ञों का पैनल भी तैयार किया जा सकता है, जो टीवी चैनलों पर लाइव बहस में करवट की व्याख्या कर अपनी निष्ठा को करवट से पुष्ट कर सके।

डेली न्यूज, जयपुर में 7 जुलाई, 2014 को प्रकाशित व्यंग्य - किस करवट बैठेगा ऊंट  
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Wednesday, 18 June 2014

पिटने वाले की तलाश - डॉ. हनुमान गालवा

पिटने वाले की तलाश
 - डॉ. हनुमान गालवा
सामंतशाही के एक किस्से का लोकशाही में रुपांतरण करके पिटी हुई पार्टी
अपने युवराज को पिटने से बचा सकती है। आज के युवराज की तरह ही रियासतीकाल
में भी युवराजों की गलती अपने सिर लेकर लाज बचाने की हमारी समृद्ध
परिपाटी रही है। राजशाही चली गई। सामंतशाही सिमट गई, लेकिन लोकशाही में
भी लाच बचाने की इस परिपाटी का बखूबी निर्वाह किया जाता रहा है। उन दिनों
अजमेर के एक प्रतिष्ठत स्कूल में केवल राजा-महाराजा और ठिकानेदारों के ही
राजकुमार पढ़ते थे। शेखावटी के एक ठिकानेदार के राजकुमार को दाखिला तो
मिल गया, लेकिन पढ़ाई में कमजोर होने के कारण रोज पिटना पड़ता था। बात
ठिकानेदार तक पहुंची। चिंतन-मनन हुआ और राजकुमार को पिटने से बचाने की
रणनीति तय हुई। तय रणनीति के मुताबिक एक बच्चे का चयन किया गया। उसे
अजमेर के उस प्रतिष्ठित स्कूल में ले जाया गया। स्कूल प्रबंधन ने दाखिला
देने से पहले पूछताछ की तो बताया गया कि यह बच्चा पढऩे के लिए नहीं आया
है। यह आपके स्कूल में रहेगा। अमुक ठिकाने के राजकुमार कोई गलती करे तो
उसे पीटने के बजाय इसकी पिटाई कर दीजिए। गलती की सजा तो मिलनी ही चाहिए
ना! सजा को रोका या कम नहीं किया जा सकता है, लेकिन सजा कोई और भुगत ले
तो दोषी को राहत दी जा सकती है। उस समय तो पिटने के लिए आए बच्चे को लेकर
आने वालों को डांट-डपट कर रवाना कर दिया, लेकिन लोकशाही में युवराज के
बदले पिटने वाले चेहरे की तलाश की जा रही है। हालांकि हर बार युवराज का
गलती को अपने सिर लेने की हौड़ मची रहती है, लेकिन इस बार हालात कुछ
ज्यादा ही खस्ता होने से अदने से कार्यकर्ता भी आंख दिखाने लगे हैं।
हालांकि आंख दिखाने वालों को बाहर का रास्ता दिखाकर कड़ा संदेश दिया गया,
लेकिन इससे भी बात बन नहीं रही है। असंतुष्टों का दुस्साहस केवल आंख
दिखाने तक ही सीमित नहीं है। वे सीधे-सीधे आलाकमान की कॉलर खींचने लगे
हैं। युवराज को ललकारने लगे हैं। युवराज के गुरु भी नालायक निकले। युवराज
को दुल्हा बनाते-बनाते खुद ही दुल्हा बन बैठे। किसकी नीयत कब खराब हो
जाए? इसे आंकने या मापने का कोई पैरामीटर नहीं है। अन्यथा, नीयत का भी
पूर्वानुमान लगाकर डैमेज एंड कंट्रोल संभव है। नीयत का पता लगाने का कोई
यंत्र भले ही नहीं बना हो, लेकिन युवराज के दोष अपने सिर लेने वाले की
तलाश और चयन के लिए लोकसभा चुनाव में प्रत्याशी चयन से कोई अलग दूसरा
फार्मूला ईजाद किया जा सकता है। दूसरा फार्मूला इसलिए जरूरी है, क्योंकि
पहले के तमाम फार्मूले पिट चुके हैं। अब यदि युवराज के बदले पिटने वाले
के चयन में भी कोई चूक रह गई तो युवराज को पिटने से कोई नहीं बचा सकेगा।
कोई उपाय नहीं हो तो राज घरानों में रोधूली (रोने वाली) की आउटसोर्सिंग
की तर्ज पर पिटने वाले की आउटसोर्सिंग की जा सकती है। पिटने की
चैम्पियनशिप भी आयोजित करवाई जा सकती है। 'पिटोकड़ा शिरोमणीÓ का नया पद
सृजित कर युवराज को पिटने से बचाने की स्थाई व्यवस्था की जा सकती है।
न्यूज टुडे, जयपुर में 18 जून, 2014 को प्रकाशित व्यंग्य
http://epaper.newstodaypost.com/290352/News-TodayJaipur/18-06-2014#page/5/2
 

Thursday, 24 April 2014

पीएम के भाषण का गुणा-भाग - डॉ. हनुमान गालवा


http://dailynewsnetwork.epapr.in/262260/Daily-news/24-04-2014#page/7/1

पीएम के भाषण का गुणा-भाग
- डॉ. हनुमान गालवा
हमारे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने दस साल में एक हजार भाषण दिए। गणितीय गणना के हिसाब से प्रधानमंत्री ने औसतन हर तीसरे दिन में एक भाषण दिया। इन भाषणों से देश को कोई फायदा हुआ या नहीं, लेकिन गणित को इन भाषणों से रुचिकर बनाया जा सकता है। मनमोहन सिंह गणित के प्रति बच्चों में बढ़ती अरुचि को लेकर प्रधानमंत्री रहते हुए चिंतित रहे। अपनी इस चिंता को गणित दिवस पर हर साल 22 दिसंबर को अपने भाषण में भी प्रकट करते है। वर्ष 2012 को गणित वर्ष और श्रीनिवास रामानुज की जयंती को राष्ट्रीय गणित दिवस के रूप में मनाने की उपलब्धि भी निर्विवाद रूप से उनके ही खाते में दर्ज है। लिहाजा गणित को रुचिकर बनाने की चिंता का गुणा-भाग किया जा सकता है। अपने कार्यकाल में अब तक दिए गए कुल एक हजार भाषणों में चार भाषण (गणित दिवस की एक घोषणा तथा गणित दिवस पर तीन उद्बोधन) गणित को रुचिकर बनाने की चिंता पर केन्द्रित रहे। प्रधानमंत्री के भाषणों के चिंतन से गणित की चिंता को विश्लेषित किया जाए तो चिंता का 0.4 प्रतिशत हिस्सा गणित को रुचिकर बनाने के हिस्से में आता है। उनकी चिंता का निदान भी उनकी भाषण में मिलता है। यह अचरज की बात है कि इस ओर अभी तक किसी का ध्यान क्यों नहीं गया। खैर, अभी भी कुछ नहीं बिगड़ा है। बच्चों को जोड़, बाकी, गुणा, भाग, औसत और प्रतिशत इन भाषणों से सिखाकर गणित को रुचिकर बनाया जा सकता है। मसलन, कुछ सवाल तैयार किए गए जा सकते हैं। हमारे प्रधानमंत्री ने दस साल में एक हजार भाषण दिए। बताइए, दस साल में स्वाधीनता दिवस पर दिए गए भाषण निकाल दिए जाएं तो शेष कितने रहेंगे? हर तीसरे दिन में प्रधानमंत्री एक भाषण देते हैं तो बताई बताइए 1200 भाषण पूरे करने के लिए उनका कार्यकाल कितना बढ़ाना पड़ेगा? महंगाई पर संसद में दिए उनके 12 बार दिए गए जवाब को भी इन भाषणों में जोड़ दिया जाए तो बताइए उन्होंने प्रतिदिन कितने भाषण दिए? प्रत्येक भाषण औसतन 45 मिनट का माना जाए तो बताइए उन्होंने कुल कितना भाषण दिया? कुल भाषण को दिन, सप्ताह और साल में बदलकर बताइए? माना कि हर भाषण में औसतन उन्होंने सोनिया गांधी के नाम का तीन बार उल्लेख किया तो बताइए उन्होंने अपने इन हजार भाषणोंं में सोनिया गांधी का कितनी बार नाम लिया? माना कि अमेरिका के राष्ट्रपति एक दिन में तीन और हमारे प्रधानमंत्री तीन दिन में एक भाषण देते हैं तो बताइए दस दिन में अमेरिकी राष्ट्रपति के बराबर आने के लिए हमारे प्रधानमंत्री को अपने औसतन भाषण से कितने ज्यादा देने पड़ेंगे?

डेली न्यूज, जयपुर में 24 अप्रेल, 2014 को प्रकाशित व्यंग्य

Sunday, 20 April 2014

नाक पर मुक्का और अहिंसा - डॉ. हनुमान गालवा

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नाक पर मुक्का और अहिंसा
 - डॉ. हनुमान गालवा
राष्ट्रपिता महात्मा गांधी कह गए थे कि कोई एक थप्पड़ मारे तो उसके सामने
दूसरा गाल कर दो। उनकी बात ठीक है, मगर कोई नाक पर मुक्का मारे तो क्या
करें? अहिंसा की ढाल तो वही है, लेकिन हिंसा का प्रकार बदल गया। हिंसा के
आकार-प्रकार के अनुरूप अहिंसा की ढाल में वैल्यू एडीशन की आवश्यकता है।
कोई एक कान खींचे तो उसके सामने दूसरा कान किया जा सकता है। कोई एक आंख
फोड़े तो उसकी आत्मा की शांति के लिए उसके सामने दूसरी आंख की जा सकती
है। कोई एक टांग तोड़े तो उसे कहा जा सकता है कि चल दूसरी भी तोड़ दे। कम
से कम चलने-फिरने के झंझट से तो मुक्ति मिलेगी। कोई एक हाथ मरोड़े तो
उसके सामने दूसरा हाथ किया जा सकता है। बात को जनसभा में नेताओं पर फेंके
जा रहे जूते के संदर्भ में कही जाए तो जूता फेंकने वाले से कहा जा सकता
है कि दूसरा भी फेंक दे। कम से कम जूते की जोड़ी तो सलामत रहेगी। बात कान
खींचने, बांह मरोडऩे, आंख फोडऩे या टांग तोडऩे या जूता फेंकने तक सीमित
होती तो चिंता की कोई बात नहीं। नाक पर मुक्का चलने लगा तब समस्या महंगाई
की तेरह बेकाबू हो गई है। इस समस्या के निदान के लिए करने को अनशन भी
किया जा सकता है और चिंतन-मनन के लिए संगोष्ठी भी आयोजित की जा सकती है।
नाक दो होते तो एक नाक पर मुक्का लगते ही दूसरा नाक आगे करके हिंसा के
प्रहार को अहिंसा की ढाल से थामा जा सकता था, लेकिन आखिर नाक तो एक ही है
ना! अब या तो दूसरी कृत्रिम नाक उगाई जाए या फिर नाक के क्षेत्र को
अहिंसा की परिधि से बाहर रखा जाए। निदान का कोई उपाय नहीं सूझे तो
गांधीजी के बंदरों से मदद ली जा सकती है। गांधीजी के तीन बंदरों में से
एक अपनी आंख बचा रहा है, दूसरा अपने कान बचा रहा है और तीसरा अपना मुंह
बचा रहा है।...ताकि  सरकार की तरह अपनी सुविधा के अनुसार चाहे तब देख सके
और चाहे तब आंख मूंद सके।  उनके पास एक चौथे बंदर को भी प्रतिष्ठित किया
जा सकता है, जो नाक पर हाथ रखकर नाक की सलामती का संदेश दे सके। कान भी
जीतने  पर खोलकर विजय का सिंहनाद सुन सके और हारने पर कान बंद करके हारकर
भी जीत का आनंद अनूभूत कर सके। मुंह का बचा रहना भी इसलिए जरूरी है,ताकि
सत्ता मिलने पर जी भरकर खाया जा सके। नाक की हिफाजत भी उस पर हाथ रखकर की
जानी चाहिए, ताकि सूंघकर पता लगाया जा सके कि घोटाले का प्रसाद खुद खाए
या फिर जनता को भी कुछ मखाणे बांटे जाएं। हालांकि कहने वाले कह सकते हैं
कि नकटे का नाक तो कटने पर बढ़ता है तो फिर नेताओं की नाक की की सुरक्षा
की क्या जरूरत?
न्यूज टुडे जयपुर में 19 अप्रेल, 2014 को प्रकाशित व्यंग्य 
https://www.facebook.com/hanuman.galwa   
 

Friday, 18 April 2014

अच्छे दिन आने वाले हैं - डॉ. हनुमान गालवा



http://dailynewsnetwork.epapr.in/259338/Daily-news/18-04-2014#page/8/1

अच्छे दिन के
कुछ उपाय
- डॉ. हनुमान गालवा
अच्छे दिन आने वाले हैं। वैज्ञानिकों ने अंतरिक्ष में सब्जियां उगाने की तकनीक विकसित कर ली है। सब्जियों की बाड़ी आसमान में होगी तो सब्जियों के भाव अपने आप जमीन पर जाएंगे। सब्जियों के भाव आसमान नहीं छू सकेंगे। आसमान से धरती पर सब्जियां गिरेंगी, तो भाव की दिशा एकदम उलट जाएगी। भाव नियंत्रण के वैज्ञानिकों के इस आर्थिक दृष्टिकोण सभी के अच्छे दिन का सुखद कोण साबित हो सकता है। सब्जी लाने को श्रीमतीजी कहे तो सब्जी मंडी जाने के बजाय थैला छत पर रखकर कहा जा सकता है कि सब्जियां गिरे तब नीचे ले आना। फिर भी, कोई शिकायत रहे तो कहा जा सकता है कि सब्जियों के लिए आसमान की ओर छलांग लगाने से तो रहा। प्रेमिका कहे तो फिर आसमान से सब्जी तोड़कर लाने या छलांग लगाने में से एक विकल्प चुनना पड़ेगा। आसमान में सब्जियों की खेती से सरकार भी फील गुड कर सकती है। सब्जियों के लिए आसमान में खेत काटे जा सकते हैं। सब्सिडी बांटी जा सकती है।
सब्जियों का समर्थन मूल्य भी घोषित किया जा सकता है, ताकि ऊंचे दामों पर खरीदकर सस्ते में बेचकर सरकार अपना और अपनों का कल्याण कर सके। कालाधन वापस लाने में भी यह विधि कारगर है। इससे कालाधन भी वापस सकता है और कालेधन वालों के भी अच्छे दिन आ सकते हैं। चूंकि खेती पर कोई कर नहीं लगता है। लिहाजा नेताओं और उद्योगपतियों को सब्जियां उगाने के लिए रियासती दरों पर हवाई खेत अलॉट किए जा सकते हैं। अघोषित आय को आसमान में उगाई सब्जियों से अर्जित आय बताकर धन के कालेपन को उजाला जा सकता है। वायदा कारोबार और सट्टा बाजार की मंडिया भी आसमान में विकसित की जा सकती है, ताकि सटोरियों के भी अच्छे दिन आ सकें। आसमान में चौथ वसूली चौकियां स्थापित कर खाकी के भी अच्छे दिन लाए जा सकते हैं। हवाई सर्वेक्षण में माहिर सर्वे कम्पनियों से आसमान मेें खेती की संभावना पर सर्वे करवाया जा सकता है। इन सर्वे के आधार पर संभावनाओं के दोहन के लिए एग्रीकल्चर रिसर्च संस्थानों के हवाई शोध केन्द्र स्थापित किए जा सकते हैं, जिससे कृषि वैज्ञानिक भी महसूस कर सकें कि उनकी अच्छे दिन आने वाले हैं। अच्छे दिन लाने के प्रयासों की हवाई ऑडिट से इन उम्मीदों को एक ठोस आधार प्रदान किया जा सकता है कि अच्छे दिन आने वाले हैं।
डेली न्यूज, जयपुर
पेज- 6, दिनांक 18 अप्रेल, 2014




Tuesday, 15 April 2014

राह दिखाता नया मॉडल - डॉ. हनुमान गालवा

न्यूज टुडे, जयपुर में 15 अप्रेल, 2014 को प्रकाशित व्यंग्य- राह दिखाता नया मॉडल
http://epaper.newstodaypost.com/257926/Newstoday-Jaipur/15-04-2014#page/5/2
राह दिखाता नया मॉडल
 - डॉ. हनुमान गालवा
चुनावी मंथन में प्रधानमंत्री पद के घोषित उम्मीदवार के विवाह का खाना भर
गया। अब वे कुंआरे नहीं रहे। कुंआरे तो वे पहले भी नहीं थे, लेकिन एक
भ्रम बना हुआ था कि उनको अविवाहित माना जाए या विवाहित? वैवाहिक स्थिति
का कॉलम खाली छोड़ते रहने से यह भ्रम गहराता जा रहा था। इस गहराते भ्रम
के बीच उनके कुंआरेपन का कोहरा छंटने के साथ ही एक पतिव्रत्ता के सिंदूर
को सम्मान मिल गया। इस सम्मान के सांस्कृतिक विमर्श पर चिंतन-मनन किया जा
सकता है। गुजरात के विकास मॉडल की तर्ज पर इसे भी एक विवाह मॉडल के रूप
में आगे बढ़ाया और भुनाया जा सकता है। पार्टी चाहे तो इस पर अपना
दृष्टिकोण पत्र पर भी जारी कर सकती है या केवल घोषणा से भी काम चलाया जा
सकता है। खैर, उनकी पार्टी इसे भुनाए या नहीं, लेकिन घोटालों के सरदार की
पार्टी के कुंआरे युवराज ने इसे चुनावी मुद्दा बना लिया। खबरिया चैनलों
को चर्चा के लिए मसाला मिल गया, जिससे कई फ्लेवर में चटनी तैयार करके
टीआरपी का तड़का लगाया जा सकता है। इसे सुखद आश्चर्य माना जा सकता है कि
'गे मैरिजÓ की पैरवी के इस दौर विवाह की चर्चा राष्ट्रव्यापी बहस का रूप
लेती जा रही है। इसके विविध आयामों पर चर्चा हो रही है। इस बहस को खबरिया
चैनल एक सार्थक दिशा दे सकते हैं। मसलन, इस पर रायशुमारी भी करवाई जा
सकती है कि अब पति स्वरूप स्वीकारने के बाद राजनीति की लीला को विराम
देकर पत्नी सेवा करनी चाहिए या फिर इस स्वीकारोक्ति को ही पत्नी की
संतुष्टि मानते हुए प्रधानमंत्री की कुर्सी पर टॉवल बिछाने के बाद ही
अश्वमेज्ञ यज्ञ की पूर्णाहुति मानी जानी चाहिए। राष्ट्रपति पद को सुशोभित
करने वाली पहली महिला ने अपने नाम के साथ पति का नाम जोड़कर पति का
सम्मान बढ़ाया। उससे पहले राजस्थान की महामहिम भी रहीं, लेकिन उनके नाम
में पतिनाम का कहीं कोई प्रभाव नहीं दिखा। खैर, पतिदेवता की प्राण
प्रतिष्ठा हो सकती है तो पत्नी को सम्मान देकर समानता की नई मिसाल पेश
क्यों नहीं की जानी चाहिए? लिहाजा इस दिशा में भी सोचा जा सकता है कि
प्रधानमंत्री बनने पर अपने नाम के साथ पत्नी का नाम भी जोड़कर भारतीय
संस्कृति का नया अध्याय क्यों नहीं लिखा जा सकता है? वैसे भी घर छोड़कर
संन्यास लेने पर नया नाम देने की परम्परा रही है तो संन्यास से फिर
गृहस्थी बनने पर भी नया नाम क्यों नहीं दिया जाना चाहिए? नया नाम हो सकता
है- जसोदाबेनपति नरेन्द्र मोदी। इसे सुविधा के हिसाब से लघु भी किया जा
सकता है। मसलन, अंग्रेजी में लिखना हो तो जे.बी.पी.एन. मोदी लिखा जा सकता
है। और इसे संघदृष्टि से भी लिखा जा सकता है- ज.बे.प.न. मोदी।