Tuesday, 15 April 2014

राह दिखाता नया मॉडल - डॉ. हनुमान गालवा

न्यूज टुडे, जयपुर में 15 अप्रेल, 2014 को प्रकाशित व्यंग्य- राह दिखाता नया मॉडल
http://epaper.newstodaypost.com/257926/Newstoday-Jaipur/15-04-2014#page/5/2
राह दिखाता नया मॉडल
 - डॉ. हनुमान गालवा
चुनावी मंथन में प्रधानमंत्री पद के घोषित उम्मीदवार के विवाह का खाना भर
गया। अब वे कुंआरे नहीं रहे। कुंआरे तो वे पहले भी नहीं थे, लेकिन एक
भ्रम बना हुआ था कि उनको अविवाहित माना जाए या विवाहित? वैवाहिक स्थिति
का कॉलम खाली छोड़ते रहने से यह भ्रम गहराता जा रहा था। इस गहराते भ्रम
के बीच उनके कुंआरेपन का कोहरा छंटने के साथ ही एक पतिव्रत्ता के सिंदूर
को सम्मान मिल गया। इस सम्मान के सांस्कृतिक विमर्श पर चिंतन-मनन किया जा
सकता है। गुजरात के विकास मॉडल की तर्ज पर इसे भी एक विवाह मॉडल के रूप
में आगे बढ़ाया और भुनाया जा सकता है। पार्टी चाहे तो इस पर अपना
दृष्टिकोण पत्र पर भी जारी कर सकती है या केवल घोषणा से भी काम चलाया जा
सकता है। खैर, उनकी पार्टी इसे भुनाए या नहीं, लेकिन घोटालों के सरदार की
पार्टी के कुंआरे युवराज ने इसे चुनावी मुद्दा बना लिया। खबरिया चैनलों
को चर्चा के लिए मसाला मिल गया, जिससे कई फ्लेवर में चटनी तैयार करके
टीआरपी का तड़का लगाया जा सकता है। इसे सुखद आश्चर्य माना जा सकता है कि
'गे मैरिजÓ की पैरवी के इस दौर विवाह की चर्चा राष्ट्रव्यापी बहस का रूप
लेती जा रही है। इसके विविध आयामों पर चर्चा हो रही है। इस बहस को खबरिया
चैनल एक सार्थक दिशा दे सकते हैं। मसलन, इस पर रायशुमारी भी करवाई जा
सकती है कि अब पति स्वरूप स्वीकारने के बाद राजनीति की लीला को विराम
देकर पत्नी सेवा करनी चाहिए या फिर इस स्वीकारोक्ति को ही पत्नी की
संतुष्टि मानते हुए प्रधानमंत्री की कुर्सी पर टॉवल बिछाने के बाद ही
अश्वमेज्ञ यज्ञ की पूर्णाहुति मानी जानी चाहिए। राष्ट्रपति पद को सुशोभित
करने वाली पहली महिला ने अपने नाम के साथ पति का नाम जोड़कर पति का
सम्मान बढ़ाया। उससे पहले राजस्थान की महामहिम भी रहीं, लेकिन उनके नाम
में पतिनाम का कहीं कोई प्रभाव नहीं दिखा। खैर, पतिदेवता की प्राण
प्रतिष्ठा हो सकती है तो पत्नी को सम्मान देकर समानता की नई मिसाल पेश
क्यों नहीं की जानी चाहिए? लिहाजा इस दिशा में भी सोचा जा सकता है कि
प्रधानमंत्री बनने पर अपने नाम के साथ पत्नी का नाम भी जोड़कर भारतीय
संस्कृति का नया अध्याय क्यों नहीं लिखा जा सकता है? वैसे भी घर छोड़कर
संन्यास लेने पर नया नाम देने की परम्परा रही है तो संन्यास से फिर
गृहस्थी बनने पर भी नया नाम क्यों नहीं दिया जाना चाहिए? नया नाम हो सकता
है- जसोदाबेनपति नरेन्द्र मोदी। इसे सुविधा के हिसाब से लघु भी किया जा
सकता है। मसलन, अंग्रेजी में लिखना हो तो जे.बी.पी.एन. मोदी लिखा जा सकता
है। और इसे संघदृष्टि से भी लिखा जा सकता है- ज.बे.प.न. मोदी।

Thursday, 20 February 2014

लो, सुधर गई राजनीति - डॉ. हनुमान गालवा


http://epaper.newstodaypost.com/232180/Newstoday-Jaipur/20-02-2014#page/5/2
लो, सुधर गई राजनीति

 - डॉ. हनुमान गालवा
बात सपने से शुरू हुई और अब फिर सपने पर ही आकर अटक गई। यानी सपने के विकल्प की तलाश सपने से ही शुरू होती है और सपने पर ही आकर खत्म होती है। आम आदमी ने राजनीति को सुधारने का सपना देखा। पहले कहा गया कि अपनी पार्टी बनाओ तो राजनीति सुधरेगी। अपनी पार्टी बना लेने पर भी सुधार नहीं दिखा तो कहा गया कि चुनाव में झाड़ू लगाओ तो सुधार दिखेगा। दिल्ली के मतदाताओं ने यह काम भी बखूबी कर दिखाया तो कहा गया कि आम आदमी की सरकार बनाओ तो सुधार दिखेगा। सरकार भी बन गई, तब भी सुधार नहीं दिखा तो सुधार को प्रकट करने के लिए मुख्यमंत्री की कुर्सी बदलने का टोटका किया। आम आदमी ने मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठने से पहले उसे बदलकर हुंकार भरी कि लीजिए सुधर गई राजनीति। लोगों ने नहीं माना तो पूर्व मुख्यमंत्री के खिलाफ जांच बैठाकर राजनीति को सुधार देने का जयघोष किया गया। इस पर पर लोग संतुष्ट नहीं हुए तो आम आदमी से खास बना आदमी पुलिस के खिलाफ धरने पर बैठ गया, तब भी राजनीति में सुधार नहीं दिखे तो कोई क्या कर सकता है? लोग कहने लगे कि धरने-प्रदर्शन से ही राजनीति सुधर जाती तो आपको राजनीति में आने की जरूरत क्यों पड़ती? बात तो ठीक है, लेकिन लोगों की बात भी गलत नहीं कि राजनीति को सुधारने के उनके सपने का क्या हुआ? केन्द्रीय मंत्री और उद्योगपति के खिलाफ मुकदमा कायम कर राजनीति में सुधार की धारणा की प्राण प्रतिष्ठा करने की कोशिश हुई। तब भी लोगों के बात नहीं जची कि राजनीति सुधर गई। आखिर हैरान-परेशान होकर अपनी सरकार गिराकर आम से खास बना आदमी फिर आम आदमी बन गया। अब तो यकीन कर लिया जाना चाहिए कि राजनीति सुधर गई है, लेकिन लोग मानने तो तैयार नहीं। अब भी राजनीति नहीं सुधरी तो फिर सपने देखिए। सपने लगातार देखते रहिए और तब तक देखते रहिए जब तक आपको राजनीति में सुधार दिख न जाए। और यह मत भूलिएगा कि यह सपने देखने भी आम से खास और खास से फिर आम आदमी बने आदमी ने सिखाए। वरना तो देश के लोग सपने देखने ही भूल गए थे। झाड़ू लगाकर साफ-सुथरे सपने देखे जा सकते हैं। अब तो मान जाइए कि राजनीति सुधर गई है। यकीन नहीं हो तो सुधार के सपने में इसे महसूस कर सकते हैं। सपने नहीं देख पा रहे हैं तो इसके लिए जनमत संग्रह करवाया जा सकता है कि सपने क्यों नहीं आ रहे हैं। या फिर मतदाताओं के बीच जाकर पूछा जा सकता है कि राजनीति को सुधारने के सपने देखें या नहीं। देखें तो किस तरह के? इन तमाम प्रयासों के बावजूद सपने नहीं देख पा रहे हैं तो ध्यान का भी सहारा लिया जा सकता है। फिर भी सपने नहीं दिख रहे हैं तो आप भी गला फाड़कर कह सकते हैं कि मेरी कोई औकात नहीं है कि मैं सपने भी देख सकूं, क्योंकि मैं बहुत छोटा आम आदमी हूं।
न्यूज टुडे जयपुर में 20 फरवरी, 2014 को प्रकाशित व्यंग्य

Friday, 24 January 2014

भोजन का अधिकार - डॉ. हनुमान गालवा

पत्रिका इयर बुक -2014 में प्रकाशित आलेख
भोजन का अधिकार - डॉ. हनुमान गालवा

Wednesday, 22 January 2014

डॉ. हनुमान - गालवा मरने को मेड़तिया, राज करने को जोधा

http://epaper.newstodaypost.com/218213/Newstoday-Jaipur/23-01-2014#page/5/1
मरने को मेड़तिया, राज करने को जोधा
 - डॉ. हनुमान गालवा
हाल ही में राजस्थान में सत्ता में वापसी के लिए हाथ मलते रह गई हाथ वाली
पार्टी के हाथ में फिर सत्ता की खुजली चलने लगी है। आशा की तरह यह खुजली
भी राजनीति का अमर धन है। सत्ता से धक्के देकर बाहर निकाले जाने पर भी
सत्ता की खाज मिटती नहीं। खुजली चलती रहती है। इसका उपचार तो केवल और
केवल सत्ता ही है। सत्ता के लिए चलने वाली खुजली सत्ता में आकर ही मिटती
है और सत्ता से आउट होते ही फिर चलने लगती है। नेताओं की यह खुजली अब तो
आम आदमी को भी लगने लग गई। नेताओं को होने वाली खुजली सभी को होने लगेगी
तो देश में सभी अपनी हथेली खुजलाते दिखेंगे। खुजली का स्कोप बढ़ेगा तो
योगगुरु भी खुजली से सत्ता पाने का कोई योग भी सिखा सकते हैं। पहले भी
नाखून रगडऩे से बाल काले करने की कला बताई तो सफेदी को कालिमा में कनवर्ट
करने कोशिश में सभी नाखून रगडऩे लगे। एकबारगी ऐसा लगने लगा, जैसे हर
समस्या के निदान का उपाय नाखून रगडऩे में ही निहित है। फिलहाल, इस बार
सत्ता के मंजे हुए खिलाडिय़ों ने हाथ खड़े कर दिए। नतीजतन सत्ता की खाज
मिटाने के लिए पार्टी की गाड़ी में नए खिलाडिय़ों को जोत दिया गया। पार्टी
की यह दशा देखकर एक युवा नेता से चुप नहीं रहा गया। कहने लगे कि टाबर ही
घर चला लेते तो बाबा को बूढ़ी क्यों लानी पड़ती? बात तो उनकी सोलह आने
खरी है, लेकिन उनको यह कौन समझाए कि राजनीति 'मरने को मेड़तिया, राज करने
को जोधाÓ मंत्र से चलती है। सिस्टम बदलने के नारे में युवराज ने भी साफ
कर दिया कि अब रेस में दौडऩे वाले घोड़ों की जरूरत है। थकते भी दौडऩे
वाले ही हैं। मतलब साफ है कि सरकार चलाने वाले घोड़े अलग होंगे।
रियासतकालीन राजस्थान में भी जंग में मेड़तियों को कमर कसने को कहा जाता
था। घाव भी रणक्षेत्र में जाने वालों के ही लगते। जब गढ़ जीत लिया जाता
था तो राजतिलक के समय बिना घाव वाले सुंदर राजकुमारों को तलाशा जाता। अब
राजकुमार चुनने का तरीका बदला है, लेकिन परिपाटी वही है। पहले भी हाथ
वाली पार्टी के इसी जादूगर को जनता ने अंगूठा बता दिया था, तब जनता की
अंगुली थमकार हाथ पकडऩे के लिए किसान नेता को कमान सौंपी गई थी। उस किसान
नेता ने पार्टी की कमान थामते ही कह दिया कि उसे तो एयरपोर्ट यानी सत्ता
की दहलीज तक बैलगाड़ी हांकनी है।  हेलीकॉप्टर में बैठने यानी सरकार की
कमान संभालने की बारी आएगी, तब कोई दूसरा आएगा। लिहाजा, उसने बुद्धिमानी
से काम लिया। चुनाव में टिकिट दिलवाने और कटवाने की खेती की और अपने
हिस्से की फसल काट ली।  अब युवाओं की बारी है। अब युवा मेड़तिया की
भूमिका तक सीमित रहेंगे या जोधा बनकर राजनीति की परिपाटी को तोड़ेंगे?
वैसे राज पाने और चलाने के लिए मेड़तिया और जोधा दोनों की ही अहमियत है।
न्यूज टुडे जयपुर में 23 जनवरी, 2014 को प्रकाशित व्यंग्य

Tuesday, 10 December 2013

डॉ. हनुमान गालवा - जबरिया डुगडुगी बजाने में मजबूरी का नाच


http://newstoday.epapr.in/196480/Newstoday-Jaipur/10-12-2013#page/5/1
जबरिया डुगडुगी बजाने में मजबूरी का नाच
 - डॉ. हनुमान गालवा
पेट्रोल के बाद अब सरकार डीजल को भी अपने नियंत्रण से मुक्त करने जा रही है। आखिर सब्सिडी की डुगडुगी से सरकार कब तक काम चलाती? अब पेट्रोल की तरह डीजल भी आजाद होकर हवा में उछल-कूद का आनंद ले सकेगा। अपनी डुगडुगी बजा सकेगा। अपनी डुगडुगी पर महंगाई को भी नचा सकेगा? जब महंगाई भी अपने हिसाब से नाच रही है, तो फिर पेट्रोल-डीजल को अपनी खुशी के इजहार से रोका जाना क्या समानता के अधिकार का उल्लंघन नहीं है? आतंक, अलगाव और नक्सली हिंसा के दानव भी बिना किसी नियंत्रण के तांडव कर रहे हैं। आखिर सरकार किस-किस को नियंत्रण में रखे? भ्रष्टाचार की पूंछ तक पकड़ में नहीं आ रही है, तो समझ लेना चाहिए कि सरकार की पकड़ ढीली हो चुकी है। योगी बाबा और सरकार के बीच पकड़म-पकड़ाई के खेेल में सरकार मुकदमों का शतक लगाने की ओर अग्रसर है, लेकिन बाबा आउट होने का नाम ही नहीं ले रहे हैं। बयानबाजी की कैंची से ही पकड़ पाती तो सरकार दाऊद इब्राहिम को कभी का पकड़ चुकी होती। सरकार भी आखिर क्या करे? सरकार को सरकार बने रहने के लिए भी गठबंधन को नियंत्रण में रख पाना कोई हंसी का खेल नहीं है। यह तो सत्ता के फेविकोल का मजबूत जोड़ है, वरना घटक दलों की दरारों में सरकार कहीं दूरबीन से भी नहीं दिखती। सरकार अपने को बचाने के लिए केवल डुगडुगी बजा रही है और खुद ही नाच-नाच कर घटक दलों को रिझा रही है। डुगडुगी बंद हुई नहीं कि सरकार के थिरकते पांवों ने जवाब दिया नहीं। सरकार ने नाचना बंद कर दिया तो घटक दलों की ताली यानी समर्थन भी बंद। जब सरकार खुद नाचने को विवश है तो फिर नाचने और नचाने को अपनी नियति मान लेने में ही समझादारी है। जो नचा सकता है, वह नाचेगा और जो नाच सकता है, वही अपने आपको बचा सकता है। बस, डुगडुगी की आवाज सुनते रहिए, समझते रहिए और उस पर अमल करते रहिए। नाचना और नचाना ही असल में लोकतंत्र है। चुनाव में उम्मीदवार नाचते हैं और मतदाता देखते हैं। मतदाताओं को जिसके ठुमके ज्यादा अच्छे लगेंगे, वोट भी वही ज्यादा ले जाएगा। चुनाव परिणाम के बाद नाचने वाला नचाने लगता है और नचाने वाला मतदाता नाचने। लोकतंत्र के नाच में किरदार और परिस्थिति बदल जाती है, लेकिन नाच का स्वरूप नहीं बदलता है। डुगडुगी बजाने वाला भी बदल जाता है, लेकिन नाच चलता रहता है। इसी चलते रहने में लोकतंत्र गतिमान है। और लोकतंत्र को बचाने और चलाने के लिए डुगडुगी बजाना जरूरी है।
न्यूज टुडे, जयपुर में 10 दिसंबर, 2013 को प्रकाशित व्यंग्य

Monday, 2 December 2013

गरीब का स्पर्श - डॉ. हनुमान गालवा


http://newstoday.epapr.in/192881/Newstoday-Jaipur/02-12-2013#page/5/1
गरीब का स्पर्श

- डॉ. हनुमान गालवा
पारस का स्पर्श पाकर लोहा भी सोना बन जाता है। यह हम पीढिय़ों से सुनते आए हैं। इस पर बिना देखे ही यकीन करते आए हैं। लोकतांत्रिक व्यवस्था में आम आदमी जिसे भी छूता है, वह महंगी हो जाती है यानी आम आदमी से दूर हो जाती है। अमेरिका तक इस धारणा को प्रमाणित कर चुका है। अमेरिका से बात चली कि भारतीयों की खुराक बढ़ जाने से दुनिया में महंगाई बढ़ी है। हमारे विशेषज्ञों ने इस अमेरिकी निष्कर्ष में अपनी राय जोड़ दी कि गांव वाले ज्यादा खाते हैं। विशेषज्ञों की इस राय से सरकार भी इनकार नहीं कर सकी। तुरंत अपनी पीठ थपथपा दी कि नरेगा से क्रय शक्ति बढ़ी है तो लोग खाएंगे ही। सरकार ने लोगों को जीमने का कानूनन अधिकार भी दे दिया, ताकि सरकार की तरह लोग भी खूब खा सकें। युवराज ने अपनी पार्टी के नारे को भी अपडेट कर दिया। बात दो रोटी से चार पर पहुंचते ही युवराज को डकार आ गई और कह दिया भरपेट रोटी खाओ और उनकी पार्टी को जिताओ। अब कहा जाने लगा है कि सब्जियों के भाव इसलिए बढ़े, क्योंकि गरीब दो-दो सब्जियां खाने लगे हैं। भला यह भी कोई बात हुई? जीने के अधिकार में रोजगार की तरह रोटी पाने और खाने के अधिकार में सब्जियां खाने का अधिकार भी निहित है। सरकार चाहे तो इस बारे में विधि विशेषज्ञों की राय ले सकती है या फिर कोई आयोग या समिति गठित कर यह सुनिश्चित कर सकती है। जरूरत पड़े तो कानून भी बनाया जा सकता है, क्योंकि आजकल हर समस्या के समाधान मेें कानून बनाकर ठंडे बस्ते में डालने का टोटका कारगर साबित हो रहा है। इस रोटी के अधिकार का रेसपोंस ठीक रहा, तो शायद सरकार अगले चुनाव के बाद नई सरकार रोटी के साथ सब्जी खाने का अधिकार भी दे दे। आम आदमी रोटी के हाथ लगता है, तो रोटी महंगी हो जाती है। सब्जी की ओर देखता है कि उसके भाव आसमान छूने लगते हैं। प्याज भी आखिर कब तक गरीब बना रहता? प्याज ने भी गरीबों से दूरी बढ़ाकर अपने आपको विशिष्ट बना लिया है। गाड़ी की सोचता है तो पेट्रोल-डीजल महंगा हो जाता है। सोना चाहता है तो 'सोनाÓ महंगा हो जाता है। बच्चों को स्कूल भेजने की सोचने से ही पढ़ाई महंगी हो जाती है। और तो और जिसे वह चुनकर भेजता है, वह भी जीतने के बाद आम आदमी से दूर हो जाता है। इसमें उसका कोई दोष नहीं है। यह तो आम आदमी के ईवीएम में उसके बटन पर ज्यादा स्पर्श के अभिशाप का नतीजा है। इस अभिशाप से दोषमुक्ति का कोई उपाय ढूंढ़ा जाना चाहिए। एक तो गाइडलाइन जारी की जा सकती है कि आम आदमी किसे स्पर्श करे और किसे नहीं। दूसरा, आम आदमी से शपथपत्र लिए जाएं कि वे गाइडलाइन की पालना करेंगे।

न्यूज टुडे जयपुर के 2/12/2013 के संस्करण में प्रकाशित व्यंग्य