Friday, 24 January 2014
Wednesday, 22 January 2014
डॉ. हनुमान - गालवा मरने को मेड़तिया, राज करने को जोधा
http://epaper.newstodaypost.com/218213/Newstoday-Jaipur/23-01-2014#page/5/1
मरने को मेड़तिया, राज करने को जोधा
- डॉ. हनुमान गालवा
हाल ही में राजस्थान में सत्ता में वापसी के लिए हाथ मलते रह गई हाथ वाली
पार्टी के हाथ में फिर सत्ता की खुजली चलने लगी है। आशा की तरह यह खुजली
भी राजनीति का अमर धन है। सत्ता से धक्के देकर बाहर निकाले जाने पर भी
सत्ता की खाज मिटती नहीं। खुजली चलती रहती है। इसका उपचार तो केवल और
केवल सत्ता ही है। सत्ता के लिए चलने वाली खुजली सत्ता में आकर ही मिटती
है और सत्ता से आउट होते ही फिर चलने लगती है। नेताओं की यह खुजली अब तो
आम आदमी को भी लगने लग गई। नेताओं को होने वाली खुजली सभी को होने लगेगी
तो देश में सभी अपनी हथेली खुजलाते दिखेंगे। खुजली का स्कोप बढ़ेगा तो
योगगुरु भी खुजली से सत्ता पाने का कोई योग भी सिखा सकते हैं। पहले भी
नाखून रगडऩे से बाल काले करने की कला बताई तो सफेदी को कालिमा में कनवर्ट
करने कोशिश में सभी नाखून रगडऩे लगे। एकबारगी ऐसा लगने लगा, जैसे हर
समस्या के निदान का उपाय नाखून रगडऩे में ही निहित है। फिलहाल, इस बार
सत्ता के मंजे हुए खिलाडिय़ों ने हाथ खड़े कर दिए। नतीजतन सत्ता की खाज
मिटाने के लिए पार्टी की गाड़ी में नए खिलाडिय़ों को जोत दिया गया। पार्टी
की यह दशा देखकर एक युवा नेता से चुप नहीं रहा गया। कहने लगे कि टाबर ही
घर चला लेते तो बाबा को बूढ़ी क्यों लानी पड़ती? बात तो उनकी सोलह आने
खरी है, लेकिन उनको यह कौन समझाए कि राजनीति 'मरने को मेड़तिया, राज करने
को जोधाÓ मंत्र से चलती है। सिस्टम बदलने के नारे में युवराज ने भी साफ
कर दिया कि अब रेस में दौडऩे वाले घोड़ों की जरूरत है। थकते भी दौडऩे
वाले ही हैं। मतलब साफ है कि सरकार चलाने वाले घोड़े अलग होंगे।
रियासतकालीन राजस्थान में भी जंग में मेड़तियों को कमर कसने को कहा जाता
था। घाव भी रणक्षेत्र में जाने वालों के ही लगते। जब गढ़ जीत लिया जाता
था तो राजतिलक के समय बिना घाव वाले सुंदर राजकुमारों को तलाशा जाता। अब
राजकुमार चुनने का तरीका बदला है, लेकिन परिपाटी वही है। पहले भी हाथ
वाली पार्टी के इसी जादूगर को जनता ने अंगूठा बता दिया था, तब जनता की
अंगुली थमकार हाथ पकडऩे के लिए किसान नेता को कमान सौंपी गई थी। उस किसान
नेता ने पार्टी की कमान थामते ही कह दिया कि उसे तो एयरपोर्ट यानी सत्ता
की दहलीज तक बैलगाड़ी हांकनी है। हेलीकॉप्टर में बैठने यानी सरकार की
कमान संभालने की बारी आएगी, तब कोई दूसरा आएगा। लिहाजा, उसने बुद्धिमानी
से काम लिया। चुनाव में टिकिट दिलवाने और कटवाने की खेती की और अपने
हिस्से की फसल काट ली। अब युवाओं की बारी है। अब युवा मेड़तिया की
भूमिका तक सीमित रहेंगे या जोधा बनकर राजनीति की परिपाटी को तोड़ेंगे?
वैसे राज पाने और चलाने के लिए मेड़तिया और जोधा दोनों की ही अहमियत है।
न्यूज टुडे जयपुर में 23 जनवरी, 2014 को प्रकाशित व्यंग्य
मरने को मेड़तिया, राज करने को जोधा
- डॉ. हनुमान गालवा
हाल ही में राजस्थान में सत्ता में वापसी के लिए हाथ मलते रह गई हाथ वाली
पार्टी के हाथ में फिर सत्ता की खुजली चलने लगी है। आशा की तरह यह खुजली
भी राजनीति का अमर धन है। सत्ता से धक्के देकर बाहर निकाले जाने पर भी
सत्ता की खाज मिटती नहीं। खुजली चलती रहती है। इसका उपचार तो केवल और
केवल सत्ता ही है। सत्ता के लिए चलने वाली खुजली सत्ता में आकर ही मिटती
है और सत्ता से आउट होते ही फिर चलने लगती है। नेताओं की यह खुजली अब तो
आम आदमी को भी लगने लग गई। नेताओं को होने वाली खुजली सभी को होने लगेगी
तो देश में सभी अपनी हथेली खुजलाते दिखेंगे। खुजली का स्कोप बढ़ेगा तो
योगगुरु भी खुजली से सत्ता पाने का कोई योग भी सिखा सकते हैं। पहले भी
नाखून रगडऩे से बाल काले करने की कला बताई तो सफेदी को कालिमा में कनवर्ट
करने कोशिश में सभी नाखून रगडऩे लगे। एकबारगी ऐसा लगने लगा, जैसे हर
समस्या के निदान का उपाय नाखून रगडऩे में ही निहित है। फिलहाल, इस बार
सत्ता के मंजे हुए खिलाडिय़ों ने हाथ खड़े कर दिए। नतीजतन सत्ता की खाज
मिटाने के लिए पार्टी की गाड़ी में नए खिलाडिय़ों को जोत दिया गया। पार्टी
की यह दशा देखकर एक युवा नेता से चुप नहीं रहा गया। कहने लगे कि टाबर ही
घर चला लेते तो बाबा को बूढ़ी क्यों लानी पड़ती? बात तो उनकी सोलह आने
खरी है, लेकिन उनको यह कौन समझाए कि राजनीति 'मरने को मेड़तिया, राज करने
को जोधाÓ मंत्र से चलती है। सिस्टम बदलने के नारे में युवराज ने भी साफ
कर दिया कि अब रेस में दौडऩे वाले घोड़ों की जरूरत है। थकते भी दौडऩे
वाले ही हैं। मतलब साफ है कि सरकार चलाने वाले घोड़े अलग होंगे।
रियासतकालीन राजस्थान में भी जंग में मेड़तियों को कमर कसने को कहा जाता
था। घाव भी रणक्षेत्र में जाने वालों के ही लगते। जब गढ़ जीत लिया जाता
था तो राजतिलक के समय बिना घाव वाले सुंदर राजकुमारों को तलाशा जाता। अब
राजकुमार चुनने का तरीका बदला है, लेकिन परिपाटी वही है। पहले भी हाथ
वाली पार्टी के इसी जादूगर को जनता ने अंगूठा बता दिया था, तब जनता की
अंगुली थमकार हाथ पकडऩे के लिए किसान नेता को कमान सौंपी गई थी। उस किसान
नेता ने पार्टी की कमान थामते ही कह दिया कि उसे तो एयरपोर्ट यानी सत्ता
की दहलीज तक बैलगाड़ी हांकनी है। हेलीकॉप्टर में बैठने यानी सरकार की
कमान संभालने की बारी आएगी, तब कोई दूसरा आएगा। लिहाजा, उसने बुद्धिमानी
से काम लिया। चुनाव में टिकिट दिलवाने और कटवाने की खेती की और अपने
हिस्से की फसल काट ली। अब युवाओं की बारी है। अब युवा मेड़तिया की
भूमिका तक सीमित रहेंगे या जोधा बनकर राजनीति की परिपाटी को तोड़ेंगे?
वैसे राज पाने और चलाने के लिए मेड़तिया और जोधा दोनों की ही अहमियत है।
न्यूज टुडे जयपुर में 23 जनवरी, 2014 को प्रकाशित व्यंग्य
Tuesday, 10 December 2013
डॉ. हनुमान गालवा - जबरिया डुगडुगी बजाने में मजबूरी का नाच
http://newstoday.epapr.in/196480/Newstoday-Jaipur/10-12-2013#page/5/1
जबरिया डुगडुगी बजाने में मजबूरी का नाच
- डॉ. हनुमान गालवा
पेट्रोल के बाद अब सरकार डीजल को भी अपने नियंत्रण से मुक्त करने जा रही है। आखिर सब्सिडी की डुगडुगी से सरकार कब तक काम चलाती? अब पेट्रोल की तरह डीजल भी आजाद होकर हवा में उछल-कूद का आनंद ले सकेगा। अपनी डुगडुगी बजा सकेगा। अपनी डुगडुगी पर महंगाई को भी नचा सकेगा? जब महंगाई भी अपने हिसाब से नाच रही है, तो फिर पेट्रोल-डीजल को अपनी खुशी के इजहार से रोका जाना क्या समानता के अधिकार का उल्लंघन नहीं है? आतंक, अलगाव और नक्सली हिंसा के दानव भी बिना किसी नियंत्रण के तांडव कर रहे हैं। आखिर सरकार किस-किस को नियंत्रण में रखे? भ्रष्टाचार की पूंछ तक पकड़ में नहीं आ रही है, तो समझ लेना चाहिए कि सरकार की पकड़ ढीली हो चुकी है। योगी बाबा और सरकार के बीच पकड़म-पकड़ाई के खेेल में सरकार मुकदमों का शतक लगाने की ओर अग्रसर है, लेकिन बाबा आउट होने का नाम ही नहीं ले रहे हैं। बयानबाजी की कैंची से ही पकड़ पाती तो सरकार दाऊद इब्राहिम को कभी का पकड़ चुकी होती। सरकार भी आखिर क्या करे? सरकार को सरकार बने रहने के लिए भी गठबंधन को नियंत्रण में रख पाना कोई हंसी का खेल नहीं है। यह तो सत्ता के फेविकोल का मजबूत जोड़ है, वरना घटक दलों की दरारों में सरकार कहीं दूरबीन से भी नहीं दिखती। सरकार अपने को बचाने के लिए केवल डुगडुगी बजा रही है और खुद ही नाच-नाच कर घटक दलों को रिझा रही है। डुगडुगी बंद हुई नहीं कि सरकार के थिरकते पांवों ने जवाब दिया नहीं। सरकार ने नाचना बंद कर दिया तो घटक दलों की ताली यानी समर्थन भी बंद। जब सरकार खुद नाचने को विवश है तो फिर नाचने और नचाने को अपनी नियति मान लेने में ही समझादारी है। जो नचा सकता है, वह नाचेगा और जो नाच सकता है, वही अपने आपको बचा सकता है। बस, डुगडुगी की आवाज सुनते रहिए, समझते रहिए और उस पर अमल करते रहिए। नाचना और नचाना ही असल में लोकतंत्र है। चुनाव में उम्मीदवार नाचते हैं और मतदाता देखते हैं। मतदाताओं को जिसके ठुमके ज्यादा अच्छे लगेंगे, वोट भी वही ज्यादा ले जाएगा। चुनाव परिणाम के बाद नाचने वाला नचाने लगता है और नचाने वाला मतदाता नाचने। लोकतंत्र के नाच में किरदार और परिस्थिति बदल जाती है, लेकिन नाच का स्वरूप नहीं बदलता है। डुगडुगी बजाने वाला भी बदल जाता है, लेकिन नाच चलता रहता है। इसी चलते रहने में लोकतंत्र गतिमान है। और लोकतंत्र को बचाने और चलाने के लिए डुगडुगी बजाना जरूरी है।
न्यूज टुडे, जयपुर में 10 दिसंबर, 2013 को प्रकाशित व्यंग्य
Monday, 2 December 2013
गरीब का स्पर्श - डॉ. हनुमान गालवा
http://newstoday.epapr.in/192881/Newstoday-Jaipur/02-12-2013#page/5/1
गरीब का स्पर्श
- डॉ. हनुमान गालवा
पारस का स्पर्श पाकर लोहा भी सोना बन जाता है। यह हम पीढिय़ों से सुनते आए हैं। इस पर बिना देखे ही यकीन करते आए हैं। लोकतांत्रिक व्यवस्था में आम आदमी जिसे भी छूता है, वह महंगी हो जाती है यानी आम आदमी से दूर हो जाती है। अमेरिका तक इस धारणा को प्रमाणित कर चुका है। अमेरिका से बात चली कि भारतीयों की खुराक बढ़ जाने से दुनिया में महंगाई बढ़ी है। हमारे विशेषज्ञों ने इस अमेरिकी निष्कर्ष में अपनी राय जोड़ दी कि गांव वाले ज्यादा खाते हैं। विशेषज्ञों की इस राय से सरकार भी इनकार नहीं कर सकी। तुरंत अपनी पीठ थपथपा दी कि नरेगा से क्रय शक्ति बढ़ी है तो लोग खाएंगे ही। सरकार ने लोगों को जीमने का कानूनन अधिकार भी दे दिया, ताकि सरकार की तरह लोग भी खूब खा सकें। युवराज ने अपनी पार्टी के नारे को भी अपडेट कर दिया। बात दो रोटी से चार पर पहुंचते ही युवराज को डकार आ गई और कह दिया भरपेट रोटी खाओ और उनकी पार्टी को जिताओ। अब कहा जाने लगा है कि सब्जियों के भाव इसलिए बढ़े, क्योंकि गरीब दो-दो सब्जियां खाने लगे हैं। भला यह भी कोई बात हुई? जीने के अधिकार में रोजगार की तरह रोटी पाने और खाने के अधिकार में सब्जियां खाने का अधिकार भी निहित है। सरकार चाहे तो इस बारे में विधि विशेषज्ञों की राय ले सकती है या फिर कोई आयोग या समिति गठित कर यह सुनिश्चित कर सकती है। जरूरत पड़े तो कानून भी बनाया जा सकता है, क्योंकि आजकल हर समस्या के समाधान मेें कानून बनाकर ठंडे बस्ते में डालने का टोटका कारगर साबित हो रहा है। इस रोटी के अधिकार का रेसपोंस ठीक रहा, तो शायद सरकार अगले चुनाव के बाद नई सरकार रोटी के साथ सब्जी खाने का अधिकार भी दे दे। आम आदमी रोटी के हाथ लगता है, तो रोटी महंगी हो जाती है। सब्जी की ओर देखता है कि उसके भाव आसमान छूने लगते हैं। प्याज भी आखिर कब तक गरीब बना रहता? प्याज ने भी गरीबों से दूरी बढ़ाकर अपने आपको विशिष्ट बना लिया है। गाड़ी की सोचता है तो पेट्रोल-डीजल महंगा हो जाता है। सोना चाहता है तो 'सोनाÓ महंगा हो जाता है। बच्चों को स्कूल भेजने की सोचने से ही पढ़ाई महंगी हो जाती है। और तो और जिसे वह चुनकर भेजता है, वह भी जीतने के बाद आम आदमी से दूर हो जाता है। इसमें उसका कोई दोष नहीं है। यह तो आम आदमी के ईवीएम में उसके बटन पर ज्यादा स्पर्श के अभिशाप का नतीजा है। इस अभिशाप से दोषमुक्ति का कोई उपाय ढूंढ़ा जाना चाहिए। एक तो गाइडलाइन जारी की जा सकती है कि आम आदमी किसे स्पर्श करे और किसे नहीं। दूसरा, आम आदमी से शपथपत्र लिए जाएं कि वे गाइडलाइन की पालना करेंगे।
न्यूज टुडे जयपुर के 2/12/2013 के संस्करण में प्रकाशित व्यंग्य
Sunday, 17 November 2013
मुखिया की पीड़ा, सहायक का रोना - डॉ. हनुमान गालवा
http://newstoday.epapr.in/185784/Newstoday-Jaipur/16-11-2013#page/5/1
मुखिया की पीड़ा, सहायक का रोना
- डॉ. हनुमान गालवा
हमारे प्रधानमंत्रीजी को शिकायत है कि पुलिस तथा जांच एजेंसी प्रशासनिक तथा नीतिगत मामलों में बिना सबूत के ही दखल दे रही है। पुलिस और जांच एजेंसी कांग्रेस के अनुगामी संगठन होते, तो इनको अपनी हद में रहने के लिए आलाकमान से भी धमकवाया जा सकता था। ये कोई सरकारी अध्यादेश भी नहीं है, जिसे युवराज से फड़वाया जा सके। चुनाव लडऩे वालों के तो टिकट कटवाए जा सकते हैं, लेकिन इनको दखल से रोकने का कोई उपाय नहीं दिख रहा है। कोई उपाय होता तो प्रधानमंत्रीजी शिकायत ही क्यों करते? शिकायत तो हमारे माननीय गृहमंत्री को भी है कि एक आतंककारी संगठन उनका कहना नहीं मानता है। उन्होंने साफ कहा कि यदि आतंकवादी संगठन उनके निर्देशन में काम करता तो देश में दंगे ही दंगे करवाते। उनका कहा उनका ही विभाग नहीं सुनता है तो फिर यह उम्मीद कैसे की जा सकती है कि कोई आतंककारी संगठन उनके निर्देश या आदेश मानेगा? गृहमंत्री की तर्ज पर माननीय प्रधानमंत्री भी देशवासियों को आश्वस्त कर सकते हैं कि यदि पुलिस तथा जांच एजेंसी उनके प्रशासनिक और नीतिगत मामले में दखल देना बंद कर दे, तो वे हालात बदल सकते हैं। प्रधानमंत्रीजी की पीड़ा समझ में आती है। वे काम करना चाह रहे हैं, लेकिन उनको काम करने नहीं दिया जा रहा है। कभी वे राजनीति में दाग बचाने के लिए अध्यादेश लाते हैं, तो युवराज उनका अध्यादेश फाड़ देता है। कभी वे महंगाई रोकने के बैठक करते हैं, तो घटक दलों के महारथी बैठक में झगडऩे लगते हैं। प्रधानमंत्रीजी की पीड़ा के निवारण के लिए भी कड़ा कानून बनवाया जा सकता है कि कोई उनको कमजोर नहीं कहेगा, कोई उनकी निंदा नहीं करेगा, कोई उनका कहना मानने से इनकार नहीं करेगा। जो ऐसा करेगा, उसे राष्ट्र विरोधी कृत्य मानते हुए कार्रवाई की जाएगी। दिक्कत केवल यह है कि प्रधानमंत्रीजी की शिकायत दूर की जाए तो केन्द्रीय गृहमंत्री के मन की मुराद की अनदेखी कैसे की जा सकती है? गृहमंत्री को नाराज करके प्रधानमंत्रीजी को खुश कैसे किया जा सकता है। आखिर वे भी देश के पहले दलित गृहमंत्री हैं। ऐसा रास्ता निकाला जाए, जिससे प्रधानमंत्रीजी की शिकायत भी दूर हो जाए और गृहमंत्री को भी कोई शिकवा नहीं रहे कि उनका मंत्रालय भी उनकी बात नहीं मानता है, आतंकवादी संगठन उनकी सुनते नहीं हंै और अब शिकायत निवारण में भी उनकी उपेक्षा। कुल मिलाकर एक ही रास्ता बचता है कि निर्णय आलाकमान पर छोड़ दिया जाए कि किसकी बात में दम है। आलाकमान जो तय करेगा, वह सभी को मंजूर होगा, अन्यथा आलाकमान दम निकालने में समर्थ हैं।
न्यूज टुडे जयपुर में 16 नवंबर, 2013 को प्रकाशित व्यंग्य
मुखिया की पीड़ा, सहायक का रोना
- डॉ. हनुमान गालवा
हमारे प्रधानमंत्रीजी को शिकायत है कि पुलिस तथा जांच एजेंसी प्रशासनिक तथा नीतिगत मामलों में बिना सबूत के ही दखल दे रही है। पुलिस और जांच एजेंसी कांग्रेस के अनुगामी संगठन होते, तो इनको अपनी हद में रहने के लिए आलाकमान से भी धमकवाया जा सकता था। ये कोई सरकारी अध्यादेश भी नहीं है, जिसे युवराज से फड़वाया जा सके। चुनाव लडऩे वालों के तो टिकट कटवाए जा सकते हैं, लेकिन इनको दखल से रोकने का कोई उपाय नहीं दिख रहा है। कोई उपाय होता तो प्रधानमंत्रीजी शिकायत ही क्यों करते? शिकायत तो हमारे माननीय गृहमंत्री को भी है कि एक आतंककारी संगठन उनका कहना नहीं मानता है। उन्होंने साफ कहा कि यदि आतंकवादी संगठन उनके निर्देशन में काम करता तो देश में दंगे ही दंगे करवाते। उनका कहा उनका ही विभाग नहीं सुनता है तो फिर यह उम्मीद कैसे की जा सकती है कि कोई आतंककारी संगठन उनके निर्देश या आदेश मानेगा? गृहमंत्री की तर्ज पर माननीय प्रधानमंत्री भी देशवासियों को आश्वस्त कर सकते हैं कि यदि पुलिस तथा जांच एजेंसी उनके प्रशासनिक और नीतिगत मामले में दखल देना बंद कर दे, तो वे हालात बदल सकते हैं। प्रधानमंत्रीजी की पीड़ा समझ में आती है। वे काम करना चाह रहे हैं, लेकिन उनको काम करने नहीं दिया जा रहा है। कभी वे राजनीति में दाग बचाने के लिए अध्यादेश लाते हैं, तो युवराज उनका अध्यादेश फाड़ देता है। कभी वे महंगाई रोकने के बैठक करते हैं, तो घटक दलों के महारथी बैठक में झगडऩे लगते हैं। प्रधानमंत्रीजी की पीड़ा के निवारण के लिए भी कड़ा कानून बनवाया जा सकता है कि कोई उनको कमजोर नहीं कहेगा, कोई उनकी निंदा नहीं करेगा, कोई उनका कहना मानने से इनकार नहीं करेगा। जो ऐसा करेगा, उसे राष्ट्र विरोधी कृत्य मानते हुए कार्रवाई की जाएगी। दिक्कत केवल यह है कि प्रधानमंत्रीजी की शिकायत दूर की जाए तो केन्द्रीय गृहमंत्री के मन की मुराद की अनदेखी कैसे की जा सकती है? गृहमंत्री को नाराज करके प्रधानमंत्रीजी को खुश कैसे किया जा सकता है। आखिर वे भी देश के पहले दलित गृहमंत्री हैं। ऐसा रास्ता निकाला जाए, जिससे प्रधानमंत्रीजी की शिकायत भी दूर हो जाए और गृहमंत्री को भी कोई शिकवा नहीं रहे कि उनका मंत्रालय भी उनकी बात नहीं मानता है, आतंकवादी संगठन उनकी सुनते नहीं हंै और अब शिकायत निवारण में भी उनकी उपेक्षा। कुल मिलाकर एक ही रास्ता बचता है कि निर्णय आलाकमान पर छोड़ दिया जाए कि किसकी बात में दम है। आलाकमान जो तय करेगा, वह सभी को मंजूर होगा, अन्यथा आलाकमान दम निकालने में समर्थ हैं।
न्यूज टुडे जयपुर में 16 नवंबर, 2013 को प्रकाशित व्यंग्य
Monday, 28 October 2013
प्याज का करिश्मा - डॉ. हनुमान गालवा
http://newstoday.epapr.in/178083/Newstoday-Jaipur/28-10-2013#page/5/1
प्याज का करिश्मा
- डॉ. हनुमान गालवा
हमारा देश वाकई करिश्माई है। रोज नए-नए करिश्मे और चमत्कार। समोसे में आलू है, लेकिन संसद से लालू गायब हो चुके हैं। घोटाले की गेंद से रशीद मसूद भाई भी क्लीन बॉल्ड हो गए हैं तो तय है कि अब राजनीति के पिच पर दागी नहीं खेल पाएंगे। यह भी किसी सपने से कम नहीं है कि सजा होते ही सत्ता का स्विच स्वत: ही ऑफ हो जाएगा। अब तो राजनीति दलों का टिकिट नेटवर्क भी दागियों के लाइन कनेक्ट हो जाने पर भी 'नोट रिचेबलÓ हो जाएगा। खैर, राजनीति में तो करिश्मे, चत्मकार होते रहते हैं। बाबा सोने के खजाने का चमत्कार दिखा रहे हैं। सरकार आम आदमी का जाप छोड़कर खजाना...खजाना जप रही है। जब देश में चहुंओर चमत्कार हो रहा है तो फिर किसान के खेत का प्याज भी खामोश क्यों बैठा रहे? आखिर प्याज ने अपनी उछल-कूद से कई बार सरकार बदलने और बनाने का करिश्मा कर दिखाया है, तो उसके चमत्कार को कौन नहीं नमस्कार करेगा? किसान के खेत का एक रुपए किलो का प्याज दिल्ली में जाकर एक सौ रुपए का हो गया। दिल्ली जाकर नेताओं के भाव बढ़ जाते हैं, तो फिर प्याज अपने नखरे क्यों नहीं दिखलाएगा? प्याज के करिश्मे को समझने के लिए अतीत की परतें उधेडऩी पड़ेंगी। मिस्टर क्लीन कह करते थे कि दिल्ली से एक रुपया भेजते हैं, जो गांव के गरीब तक पहुंचते-पहुंचते पंद्रह पैसे रह जाता है। एक रुपए के पंद्रह पैसे में सिमट जाने की गुत्थी को भी प्याज के करिश्मे से ही सुलझाया जा सकता है। किसान के हाथ से प्याज निकलता है, तब उसे कोई खास भाव नहीं देता है। मंडी में थोक एवं खुदरा विक्रेताओं के चमत्कारिक स्पर्श से प्याज आम से खास हो जाता है। भंडार में रहते-रहते प्याज को चमत्कारिक बाबा की तरह अपनी शक्ति का अहसास होता है। कुछ दिन विश्राम के बाद जब प्याज ठेले पर विराजमान होकर गली-कूचे में भ्रमण करता है, तब उसे अपनी अहमियत का अंदाज हो जाता है। यहीं आकर सरकार को उसके छिलके भी डराने लगते हैं, लेकिन सत्ता में आने के सपने पाले प्रतिपक्ष को उसका तीखापन भी मीठेपन का अहसास देता है। प्याज सरकार के लिए बम है, तो सत्ताभिलाषी विपक्षी नेताओं के लिए सपने साकार करने वाला बाबा है। प्याज का सपना किसी को राजयोग दिखाता है, तो किसी को सत्तावियोग। यह प्याज का ही चमत्कार है कि एक ही सपने में संयोग और वियोग दोनों तरह की अनुभूति का अहसास हो जाता है। प्याज शनि की तरह कुंडली में बैठकर किसी को राजा भी बना सकता है और राजा को रंक भी बना सकता है।
न्यूज टुडे जयपुर में 28 अक्टूबर, 2013 को प्रकाशित व्यंग्य
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